उत्तराखंड: भाजपा में अब कौन संभालेगा कांटों भरा ताज, नए सीएम के नाम पर बुधवार को होगा फैसला
- सियासी गलियारे में, निशंक, धन सिंह और महाराज पर निगाह
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उत्तराखंड में करीब चार साल सीएम रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई के बाद अब भाजपा में प्रदेश के नए मुख्यमंत्री का सवाल उठ खड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री कौन होगा, यह बुधवार को विधायक दल की बैठक में साफ होगा। अभी तक तीन नाम सामने आए हैं और सियासी गलियारे में चर्चा यह भी है कि प्रदेश के ही एक पूर्व मुख्यमंत्री पर भाजपा दाव खेल सकती है।
विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी भाजपा के लिए नए मुख्यमंत्री का चुनाव आसान काम नहीं है। त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई के गिनाए जा रहे कारण अगर विधायकों का असंतोष, कर्मचारियों में नाराजगी और भाजपा का गिरता ग्राफ ही है तो नए मुख्यमंत्री को भी इन सब चुनौतियों से पार पाने में सक्षम होने का विश्वास दिलाना होगा। चुनावी वैतरणी से पार पाने की कुव्वत ही भाजपा में नए मुख्यमंत्री के चुनाव का आधार भी बन सकता है।
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इन सब परीक्षाओं को देखा जाए तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री और हरिद्वार सांसद रमेश पोखरियाल निशंक को सबसे प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। निशंक एक बार पहले भी प्रदेश के मुखिया की कमान संभाल चुके हैं। लोक सभा चुनाव में हरिद्वार से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ उन्होंने जीत दर्ज की तो उन्हें केंद्र में भी शिक्षा जैसा भारी भरकम मंत्रालय मिला। नई शिक्षा नीति पर निशंक ने काम कर खुद को साबित भी किया। उन्हें संकट मोचक के रूप में भी देखा जा रहा है। इतना जरूर है कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाने पर भाजपा को हरिद्वार संसदीय सीट पर दोबारा चुनाव में जाना होगा।
इसी तरह नए मुख्यमंत्री के रूप में उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत का नाम इस सियासी गहमा गहमी के बीच तेजी से उभर कर सामने आया। जिस तरह से धन सिंह रावत को मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर भेजकर देहरादून बुलाया गया, उससे इन चर्चाओं को बल मिला है। आरएसएस पृष्ठभूूमि, किसी बड़े मामले में नाम सामने न आने, विधायकों से संवाद धन सिंह को मजबूत भी कर रहे हैं। उनका कभी हाई प्रोफाइल में न रहना उनके खिलाफ जा सकता है।
जब-जब भाजपा में असंतोष के सुर उठे, प्रदेश के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का नाम भी उभर कर सामने आया। महाराज पर कांग्रेस से आयातित होने का ठप्पा है। इतना होने पर भी महाराज अपने बड़े कद, भाजपा की विचारधारा के करीबी होने के कारण स्वाभाविक रूप से महाराज का नाम भी लिया जाता रहा है।