Uttarakhand@25: शून्य गरीबी वाला देश का पहला राज्य बन सकता है उत्तराखंड, पढ़ें संजीव चोपड़ा का ये खास लेख
Special article by@Sanjeev Chopra: नए राज्य के गठन के वक्त हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों को पर्वतीय राज्य में शामिल करने को लेकर विवाद था। हालांकि यह बात साफ थी औद्योगिक संपदा, प्रचुर भूमि और सबसे ज्यादा कृषि उत्पादन वाले इन दो जिलों को शामिल किए बिना राज्य की परिकल्पना संभव नहीं थी। राज्य निर्माण के बाद के वर्षों में मुझे उत्तराखंड शासन में काम करने का लंबा अनुभव मिला।
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गरीबी और विस्थापन जैसे मुददों पर उसने तब तक कितनी प्रगति कर ली होगी! एक-एक करके इन सभी सवालों का जवाब देने का प्रयास मैं करूंगा। लगता है जैसे कल ही की बात हो जब आंदोलनकारियों के लंबे संघर्ष के बाद पर्वतीय राज्य की मांग कर रहे लोगों का सपना हकीकत में बदला और उत्तराखंड के रूप में नया राज्य मिला।
मुझे याद आ रहा है कि नए राज्य के गठन के वक्त हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों को पर्वतीय राज्य में शामिल करने को लेकर विवाद था। हालांकि यह बात साफ थी औद्योगिक संपदा, प्रचुर भूमि और सबसे ज्यादा कृषि उत्पादन वाले इन दो जिलों को शामिल किए बिना राज्य की परिकल्पना संभव नहीं थी। अगर ये दोनों जिले शामिल नहीं होते तो राज्य आर्थिक रूप से कमजोर होता और केंद्र की मदद का हद से ज्यादा मोहताज होता। राज्य निर्माण के बाद के वर्षों में मुझे उत्तराखंड शासन में काम करने का लंबा अनुभव मिला।
उत्तराखंड में मेरा वह कार्यकाल बहुत संतोषजनक रहा
मैंने अपना करियर ग्रामीण विकास, पंचायत एवं बागवानी विभाग के सचिव के तौर पर शुरू किया था। बाद में राज्य के औद्योगिक विकास विभाग के सचिव के रूप में नियुक्त होने से पहले सितंबर 2003 में सहकारिता विभाग का प्रभार भी मिला, जिसे मैंने जनवरी 2007 तक संभाला।मैं मानता हूं कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की बदौलत उत्तराखंड में मेरा वह कार्यकाल बहुत संतोषजनक रहा। उस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री स्व. एनडी तिवारी थे। तिवारी जी को ‘नो डिले तिवारी’ कहा जाता था। उनका सपना था कि ग्रामीण विकास और औषधीय पौधों से लेकर निवेश तक सभी मोर्चों पर उत्तराखंड को देश का नंबर एक राज्य बनाया जाए।
औद्योगिक विनिर्माण के साथ-साथ आईटी हब के रूप में इस प्रदेश को विकसित करने की भी उनकी मंशा थी। नवंबर 2000 में जब अलग राज्य बनाया गया था, तब प्रदेश का गरीबी अनुपात 40 फीसदी के करीब था। अगले 10 साल में यह रेशो 12 प्रतिशत से भी कम पर आ गई। यह संभव हुआ पर्यटन,साहसिक पर्यटन, औषधीय पौधों के लिए बाजार उपलब्ध कराने के साथ ही इंडस्ट्री पर जोर देने से।
वर्तमान में भी गरीबी अनुपात का यह आंकड़ा दस फीसदी के आसपास है। इसका मतलब साफ है कि राज्य गठन के बाद पहले दशक यानी 2000-01 से 2010-11 के बीच गरीबी में गिरावट की रफ्तार बहुत ज्यादा थी। उसके अगले दशक यानी 2011-2021 के बीच गरीबी कम होने की रफ्तार खासी कम रही। बहरहाल, यही वह बिंदु है जहां मैं राज्य के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव देना चाहता हूं।
सही नीतियां अपनाई जाएं तो उत्तराखंड कर सकता है एक करिश्मा
मुझे लगता है कि अगर सही नीतियां अपनाई जाएं तो उत्तराखंड एक करिश्मा कर सकता है। वह अगले तीन साल में ही देश का पहला राज्य बन सकता है जहां एक भी नागरिक गरीबी रेखा से नीचे नहीं होगा। आज देश में गोवा, केरल, पंजाब और हिमाचल ऐसे राज्य हैं जहां सबसे कम गरीबी बची है। दिल्ली व चंडीगढ़ जैसे केंद्रशासित शहरों में यूं तो प्रति व्यक्ति आय बहुत ही ज्यादा है लेकिन वहां शहरी गरीबी भी कम नहीं है।
ऐसे में उत्तराखंड के पास एक सुनहरा अवसर है। ऐसी नीतियां अपनाने का अवसर कि हम सबसे पहले शून्य गरीबी वाला राज्य बन कर उभरें। लेकिन यह होगा कैसे? मेरी राय में राज्य में एक खास `सहभागिता और सशक्तीकरण विभाग` की स्थापना की जानी चाहिए ताकि अगले तीन वर्षों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी व्यक्तियों को पर्याप्त कौशल और संसाधन दिए जा सकें। साथ ही उनके लिए घर का भी इंतजाम किया जा सके।
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कुछ हफ्ते पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से अमर उजाला विशिष्ट नागरिक पुरस्कार स्वीकार करते हुए, मैंने सुझाव दिया था कि उत्तराखंड को अपने ग्रामीण विकास विभाग का नाम बदलकर `सहभागिता और सशक्तीकरण विभाग` कर देना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो ग्रामीण विकास विभाग का एक पूर्व सचिव होने के नाते मुझे बहुत खुशी होगी। वास्तव में अब समय आ गया है कि आर्थिक सुधार, सामाजिक उत्थान के साथ ही कौशल विकास, उद्यमिता और वित्तीय समावेश पर अधिक जोर दिया जाए।
देवभूमि को कीर्तिमान की तरफ ले चलें
अभी जो पॉलिटेक्निक कॉलेज हैं। उनमें स्टाफ की कमी है और वे एक तरह से सरकारी दफ्तर की तरह काम कर रहे हैं। ये पॉलिटेक्निक कॉलेज गरीबी उन्मूलन के अभियान में केंद्रीय भूमिका निभा सकते हैं। इन कॉलेजों में
पर्याप्त स्टाफ रखा जाए तो इन्हें लघु उद्यम, स्टार्ट आप को बढ़ावा देने वाले केंद्र के रूप में स्थपित कर सकते हैं। याद रहे साइकिल रिपेयर शॉप या सिलाई केंद्र भी स्टार्ट अप ही होते हैं। बच्चों को स्कूल छोड़ने वाली वैन शुरू करने का काम भी एक तरह का स्टार्ट अप ही होता है।
हमारे पॉलिटेक्निक ऐसे नन्हे नन्हे स्टार्टअप शुरू करने वाले लाखों लघु उद्यमी खड़े करने में योगदान दे सकते हैं। ये लघु स्टार्टअप उद्यमी केंद्रीय परियोजनाओं के लाभार्थी नहीं होते। वे तो पार्टनर यानी भागीदार होते हैँ। लाभार्थी का मतलब लाभ लेने वाला। पार्टनर का मतलब सरकार के साथ मिलकर काम करने वाला। आइए देवभूमि को कीर्तिमान की तरफ ले चलें। उत्तराखंड को देश का ऐसा पहला राज्य बनने दें जो सहभागिता और मानव सशक्तीकरण को अपनी विकास रणनीति का मुख्य सिद्धांत बनाकर गरीबी से पूरी तरह मुक्ति पा लेगा।
(Special article by@Sanjeev Chopra: लेखक सेवानिवृत आईएएस अधिकारी हैं। वह मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के निदेशक भी रहे हैं। उत्तराखंड में उनका खासा लंबा प्रशासनिक कार्यकाल रहा है।)