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उत्तराखंड: 319 साल पुराना दुर्लभ ताम्रपत्र मिला, राजा ज्ञान चंद ने ग्रामीणों को लिखकर दान में दी थी जमीन 

Sat, 31 Oct 2020 12:12 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अल्मोड़ा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अल्मोड़ा Published by: अलका त्यागी Updated Sat, 31 Oct 2020 12:12 AM IST
सार

  • राजा ज्ञान चंद के काल का है ताम्रपत्र, इसमें 300 नाली भूमि तीन लोगों को दान करने का आदेश
  • पुरातत्व विभाग जल्द ही इस ताम्रपत्र को विभाग में करवाएगा रजिस्टर्ड 

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Uttarakhand Latest News: 319 years old Rare Ancient Copper plates Found in almora
319 साल पुराना ताम्रपत्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड के अल्मोड़ा में पुरातत्व विभाग को राजा ज्ञान चंद के शासनकाल का करीब 319 साल पुराना एक दुर्लभ ताम्रपत्र मिला है। ताम्रपत्र के जरिए राजा ज्ञान चंद ने द्वाराहाट के दूनागिरि क्षेत्र में सिमल्टिया निवासी तीन व्यक्तियों को ज्यूला और खुनौ की पैताल की भूमि से लगी हुई 300 नाली भूमि दान में दी थी।

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यह ताम्रपत्र सिमल्टा गांव के मूल निवासी अवकाश प्राप्त कर्नल दिव्यदर्शन पांडे के पास सुरक्षित रखा हुआ है। पुरातत्व विभाग जल्द ही इस ताम्रपत्र को विभाग में रजिस्टर्ड भी करवाएगा। ताम्रपत्र कुमाऊंनी भाषा और देवनागिरीलिपि में लिखा गया है। 
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यह दुर्लभ ताम्रपत्र राजा ज्ञानचंद ने 18 अगस्त 1701 को पूर्णिमा के दिन जारी किया था। ताम्रपत्र में चक्रगिरधर, जैराम और चंद्रेश्वर सिमल्टिया को 300 नाली भूमि दान में देने की घोषणा की गई है। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. चंद्र सिंह चौहान ने बताया कि सहायक अधीक्षण पुराविद् मनोज जोशी के माध्यम से ही इस दुर्लभ ताम्रपत्र के बारे में जानकारी मिली।
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ताम्रपत्र सिमल्टा निवासी अवकाशप्राप्त कर्नल दिव्यदर्शन पांडे के पास मिला है। जो अब बंगलूरू में रहते हैं। डॉ. चौहान ने बताया कि ताम्रपत्र उन्हीं के घर पर रहेगा लेकिन इसे पुरातत्व विभाग में रजिस्टर्ड करने की कार्यवाही भी की जा रही है। कुछ दिन पूर्व भी एक अन्य दुर्लभ ताम्रपत्र मिला था, जिसमें राजा ज्ञान चंद द्वारा सिमल्टा गांव को दान में देने का आदेश जारी किया गया था। 

ताम्रपत्र का हिंदी अनुवाद

महाराजधिराज श्री ज्ञानचंद देव जी ने पूर्णिमा के दिन श्री चक्रगिरधर, जैराम और चंद्रेश्वर सिमल्टिया को संकल्प कर भूमि दी। कुमाऊं में 15 बीसी (300 नाली भूमि)  बोरा की आली में से ज्युला और खुनी की पैताल की भूमि से लगा हुआ ईजर सभी करों से मुक्त कर दिया। राजा ज्ञान चंद के वंशजों द्वारा उपभोग करवाना होगा और चक्रधर गिरधर, जैराम और चंद्रेश्वर सिमल्टिया की संतति को भोग करना होगा। जमीन के अंदर की वस्तु को छोड़कर सभी करों, घोड़ों, कुत्तों, बाजा बजाने वाले आदि जो महर कर था उससे भी मुक्त कर दिया गया है।  

ताम्रपत्र के ये लोग रहे गवाह
जगत सिंह लल्लाज्यू (जगत चंद), वीरेश्वर पुरोहित, लछीमीपति पांडे, प्रतापादित्य, हरीमल, भीम सिंह गुसाईं, मान सिंह, श्रीरिषीकेश, भावानंद जोशी, नरसिंहसाहू, कुमाऊं का नेगी, कृष्णदेव अधिकारी, माउई का गर्खा नेगी, कर्ण सिंह भंडारी और जगत सैज्याली। भवानंद जोशी ने बृहस्पतिवार 15 गते सावन शुक्ल पक्ष साके 1623 में लिखा और भौना सुनार ने इसे टंकण किया। 

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