उत्तराखंड: हाईकोर्ट ने सभी निर्माणाधीन हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट पर लगाई रोक, जानें पूरा मामला
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हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगा दी है। अदालत ने मलबे के निस्तारण के लिए डंपिंग जोन बनाने के निर्देश भी दिए हैं। अदालत ने सभी जिलाधिकारियों से यह सुनिश्चित कराने को कहा है कि मलबे का निस्तारण और भंडारण नदियों से 500 मीटर दूर हो। कोर्ट ने कहा कि इस आदेश का उल्लंघन होने पर उन्हें (जिलाधिकारियों को) व्यक्तिगत रूप से दोषी माना जाएगा।
कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित कराने को कहा कि नदियों में कम से कम 15 फीसदी प्रवाह बना रहे। भविष्य में बनने वाली परियोजनाओं में डंपिंग जोन के निर्धारण की शर्त अनिवार्य किए जाने के भी निर्देश भी अदालत ने दिए हैं।
वरिष्ठ न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। रुद्रप्रयाग के हिमाद्रि जन कल्याण संस्थान ने जनहित याचिका दायर कर प्रदेश की नदियों में अवैध रूप से मलबे को निस्तारित किए जाने के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोने की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहीं कंपनियां अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी, एल एंड टी उत्तरांचल हाइड्रो पावर और लैंको हाइड्रो एनर्जीज निर्माण से निकल रहे मलबे को अलकनंदा और मंदाकिनी के किनारे पर डाल रहे हैं।
यह मलबा नदियों को प्रदूषित कर रहा है और पर्यावरण को असंतुलित कर रहा है। याचिका में कहा गया कि नदियों में बहकर आने वाले मलबे से जन-धन की बहुत हानि हो चुकी है और भविष्य में भी त्रासदी की आशंका है।
याचिका में कहा गया कि इन कंपनियों को शर्तों पर डंपिंग जोन आवंटित किए गए थे, लेकिन स्थानीय प्रशासन से साठगांठ कर मलबे को आवंटित जोनों में डालने की बजाय नदियों और राष्ट्रीय राजमार्ग-58 के किनारे फेंका जा रहा है, जहां अब तक करोड़ों टन मलबा निस्तारित किया जा चुका है। याचिका में कहा गया कि कई डंपिंग जोन 2013 की आपदा में बह गए थे और कंपनियों ने दूसरे जोन निर्धारित नहीं किए।
याची के अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता ने कोर्ट में कहा कि भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 2013 की आपदा की जांच रिपोर्ट में माना है कि इस दौरान नदियों में भारी उफान और उनका रास्ता बदल जाने का मुख्य कारण इनके किनारों पर मलबे का अनुचित निस्तारण था और नदियों के अचानक प्रवाह बदल लेने से भारी जनहानि और संपत्ति को नुकसान हुआ था। याचिका में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं को प्रतिबंधित करने, डंपिंग जोन निर्धारित करने और पूर्व में हुई जन-धन की हानि का मुआवजा दिलवाने की मांग की गई थी।
पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि मंदाकिनी और अलकनंदा गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदियां हैं। गंगा नदी पहले ही सिकुड़ रही है, ऐसे में इनसे छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अत: पोषणीय और संतुलित विकास के लिए इनको सुरक्षित रखा जाना आवश्यक है।