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उत्तराखंड: हाईकोर्ट का आदेश, एनआईओएस से डीएलएड अभ्यर्थियों को शिक्षक भर्ती में करें शामिल 

Thu, 04 Mar 2021 12:03 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 04 Mar 2021 12:03 AM IST
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Uttarakhand High court Order to Include DLED Applicants in teacher Recruitment
- फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान (एनआईओएस) से दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से डीएलएड प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों को राजकीय प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक के पदों की नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने इन अभ्यर्थियों को सहायक अध्यापक भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने से रोकने वाले 10 फरवरी 2021 के शासनादेश पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। हाईकोर्ट के इस फैसले से करीब 37 हजार अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी।

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न्यायमूर्ति रविन्द्र मैठाणी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार नंदन सिंह बोहरा, निधि जोशी, गंगा देवी, सुरेश चंद्र गुरुरानी, संगीता देवी और गुरमीत सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राज्य सरकार के 10 फरवरी 2021 के शासनादेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सीडी बहुगुणा ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता 2019 में एनआईओएस के दूरस्थ शिक्षा माध्यम से डीएलएड प्रशिक्षण प्राप्त हैं लेकिन राज्य सरकार ने इस माध्यम से प्रशिक्षितों को सहायक अध्यापक प्राथमिक की नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर कर दिया है।
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याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केंद्र सरकार ने 16 दिसंबर 2020 और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने 6 जनवरी 2021 को जारी आदेश में एनआईओएस की दूरस्थ शिक्षा पद्धति से डीएलएड प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों को अन्य माध्यमों से प्रशिक्षित अभ्यर्थियों के समान माना है। इन तर्कों के आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से जारी शासनादेश पर अगले आदेश तक रोक लगाते हुए इन अभ्यर्थियों को भी सहायक अध्यापक प्राथमिक शिक्षा की भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने के लिए कहा है।

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याचिकाकर्ता को सहायक वन संरक्षक की मुख्य परीक्षा में शामिल करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग को 13 मार्च को होने वाली सहायक वन संरक्षक की मुख्य परीक्षा में याचिकाकर्ता को भी शामिल करने के निर्देश दिए हैं।  मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। हल्द्वानी निवासी तपन बहुगुणा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की ओर से 30 जुलाई 2019 को सहायक वन संरक्षक के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला गया था। इसके लिए याचिकाकर्ता ने भी आवेदन किया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि 3 नवंबर 2019 को हुई प्रारंभिक परीक्षा उसने भी दी थी। 10 जनवरी 2020 को आए परिणाम में वह सफल हुआ था।


आयोग ने 17 जनवरी 2020 को विज्ञापन जारी कर पास हुए अभ्यर्थियों से शुल्क जमा करने और अन्य आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करने के लिए कहा। याचिकाकर्ता ने कहा कि उसने मुख्य परीक्षा के लिए समस्त प्रमाणपत्र एवं निर्धारित शुल्क जमा कर दिया लेकिन आयोग ने 10 दिसंबर 2020 को अनर्ह अभ्यर्थियों की जो सूची जारी की, उसमें उसका भी नाम था। आयोग ने इसका कारण उनका आईटी में बीटेक डिग्रीधारक होना बताया। याची का कहना है कि विज्ञापन में शैक्षिक अर्हता में स्पष्ट कहा गया था कि अभ्यर्थी को बैचलर ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग की डिग्रीधारक होना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि आईटी में बीटेक भी इंजीनियरिंग डिग्री ही होती है। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को सहायक वन संरक्षक के पदों के लिए 13 मार्च को होने वाली मुख्य परीक्षा में शामिल करे।

हाईकोर्ट ने ई-लर्निंग सामग्री खरीद घोटाले में सरकार से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने पौड़ी जनपद के चौबट्टाखाल क्षेत्र के 49 विद्यालयों के लिए विधायक निधि से खरीदी गई ई-लर्निंग सामग्री में मुख्य शिक्षा अधिकारी (सीईओ) द्वारा किए घोटाले के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। 

मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान एवं न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई में हुई। मामले के अनुसार पूर्व प्रबंधक पब्लिक स्कूल जोगीमढ़ी पूरन सिंह नेगी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि 2020-21 में चौबट्टाखाल के 49 विद्यालयों के लिए विधायक निधि से ई लर्निंग सामग्री खरीदी गई। यह सामग्री मुख्य शिक्षा अधिकारी के माध्यम से खरीदी गई। जो सामग्री खरीदी गई उनमें एलईडी टीवी भी थे, लेकिन एलईडी टीवी खराब मिले।


जब इसकी शिकायत जिलाधिकारी से की गई तो उन्होंने एक तीन सदस्यी कमेटी गठित कर जांच के आदेश दिए थे। जांच में पाया गया कि जिस कंपनी से एलईडी टीवी खरीदे गए थे, वह कंपनी 20 वर्ष पहले ही बंद हो चुकी है। जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में मुख्य शिक्षा अधिकारी को दोषी पाया। याचिकाकर्ता ने दोषी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की थी। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।

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