जिंप अध्यक्षों को राज्य मंत्री की तरह सुविधाएं देने के प्रत्यावेदन पर निर्णय ले सरकार: हाईकोर्ट
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नैनीताल हाईकोर्ट ने जिला पंचायत अध्यक्षों को राज्य मंत्री की तरह सुविधाएं देने के मामले में दायर याचिका को निस्तारित कर दिया है। कोर्ट ने ऊधमसिंह नगर की जिला पंचायत अध्यक्ष को राज्यमंत्री की सुविधाएं देने के संबंध में दिए प्रत्यावेदन पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने के निर्देश सरकार को दिए हैं।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार ऊधमसिंह नगर की जिला पंचायत अध्यक्ष रेनू गंगवार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि 1978 से लेकर 2014 तक अलग-अलग शासनादेश के माध्यम से जिला पंचायत अध्यक्षों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया और सुविधाएं अनुमन्य की गईं, मगर सरकार की ओर से सुविधाएं नहीं दी गईं।
सुविधाओं में एस्कॉर्ट, कार्यालय सहित अन्य सुविधाएं शामिल हैं। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिका को निस्तारित करते हुए सरकार को याचिकाकर्ता के प्रत्यावेदन को तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए।
जिला पंचायत अध्यक्ष लोक सेवक, नहीं कर सकतीं ठेकेदारी
हाईकोर्ट ने जिला पंचायत अध्यक्ष बागेश्वर बसंती देव की याचिका को खारिज करते हुए सरकार को उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की छूट दी है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अनुरोध पर उनकी गलत याचिका के लिए जुर्माना नहीं लगाया।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार बागेश्वर की जिला पंचायत अध्यक्ष बसंती देव ने हाईकोर्ट में उनकी ए श्रेणी की सरकारी ठेकेदारी का रजिस्ट्रेशन लोक निर्माण विभाग द्वारा 15 मई 2020 को रद्द करने के आदेश को चुनौती दी थी। लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता देहरादून ने बसंती देव का ठेकेदारी रजिस्ट्रेशन उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम 2016 के अनुसार रद्द किया था। इस अधिनियम में जिला पंचायत अध्यक्ष को लोक सेवक की श्रेणी में माना गया है जो सरकारी ठेके नहीं ले सकता।
सुनवाई में एकलपीठ ने माना कि याचिकाकर्ता को जिला पंचायत अध्यक्ष चुने जाने के तुरंत बाद सरकारी ठेकेदार का रजिस्ट्रेशन रद्द किए जाने के लिए विभाग में आवेदन करना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और यदि जिला पंचायत अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने सरकारी कामों में ठेकेदारी जारी रखी है तो शासन उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने को स्वतंत्र है। कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया लेकिन याचिकाकर्ता के अनुरोध पर कोर्ट ने उन पर जुर्माना नहीं लगाया।