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उत्तराखंड हाईकोर्ट: परमार्थ निकेतन मामले में दायर याचिका वापस ली, कोरोनिल मामले में छह को सुनवाई 

Wed, 05 Aug 2020 12:01 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 05 Aug 2020 12:01 AM IST
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Uttarakhand High court order for Coronil and parmarth niketan
- फोटो : फाइल फोटो

नैनीताल हाईकोट में परमार्थ निकेतन ऋषिकेश के समीप निर्माण कार्य करने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद म्यूटेशन संबंधी पत्रावलियों की उलब्धता को देखते हुए याचिकाकर्ता ने याचिका को वापस ले ली।

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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार हरिद्वार निवासी अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि चिदानंद मुनि की ओर से कूटरचित दस्तावेज तैयार कर जमीन पर अतिक्रमण कर भारी निर्माण कर दिया गया है। याचिका में कहा कि 2.39 एकड़ सरकारी भूमि पर कब्जा किया गया है।
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पिछले दिनों कोर्ट ने अतिक्रमण मामले में नोटिस देने व 15 दिन में उसका निस्तारण करने के निर्देश दिए थे। अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने बताया कि म्यूटेशन संबंधी कागजात जुटाने के बाद फिर से याचिका दायर की जाएगी। फिलहाल उन्होंने इस संबंध में दायर याचिका को वापस ले लिया है।

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बाबा रामदेव की कोरोनिल दवा के मामले में सुनवाई 6 को

हाईकोर्ट ने पतंजलि योगपीठ की दिव्य फार्मेसी कंपनी से निर्मित कोरोनिल दवा के मामले की सुनवाई के लिए 6 अगस्त की तिथि नियत की है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।

हाईकोर्ट के अधिवक्ता मनि कुमार ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि बाबा रामदेव तथा उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने कोरोना वायरस से निजात दिलाने के लिए पतंजलि योगपीठ की दिव्य फार्मेसी कंपनी से निर्मित कोरोनिल दवा लांच की है। याचिका में कहा कि बाबा रामदेव की दवा कंपनी ने आईसीएमआर की ओर से जारी गाइडलाइन के नियमों का भी पालन नहीं किया है। यही नहीं, आयुष मंत्रालय भारत सरकार की अनुमति भी नहीं ली गई है।

आयुष विभाग उत्तराखंड में जो आवेदन किया गया था, वह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए था। इसी की आड़ में कोरोनिल दवा का निर्माण किया गया। कंपनी ने निम्स विवि राजस्थान से दवा का परीक्षण कराए जाने की बात कही, जबकि निम्स का कहना है कि विवि ने ऐसी किसी भी दवा का क्लिनिकल परीक्षण नहीं किया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि दवा का भ्रामक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। दवा न तो आईसीएमआर से प्रमाणित है और ना ही इनके पास इसे बनाने का लाइसेंस है। दवा का अभी तक क्लिनिकल परीक्षण भी नहीं कराया गया है। इसलिए दवा पर पूर्ण रूप से रोक लगाई जाए। याचिकाकर्ता की ओर से आईसीएमआर की ओर से जारी गाइडलाइन के आधार पर भ्रामक प्रचार के लिए कानूनी कार्रवाई करने की मांग की थी।

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