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इज्जत बचाने को इस बार भी कोर्ट का आसरा

Sat, 15 Nov 2014 03:27 PM IST
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 15 Nov 2014 03:27 PM IST
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uttarakhand government.

मिनिस्ट्रीयल कर्मियों के बाद अब सचिवालय की हड़ताल पर भी हाई कोर्ट द्वारा दिशा निर्देश देना कई सवाल खड़े करता है।

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क्योंकि पिछले आठ दस सालों में कर्मचारियों के सामने सरकार ने या तो हथियार डाले या फिर हाई कोर्ट के सहारे इज्जत बचाई। सवाल यही है जो काम हाई कोर्ट कर रहा है उसमें करने में सरकार परहेज क्यों करती है ?

सरकार का पसीना छूट गया
मिनिस्ट्रीयल कर्मियों की हड़ताल के खिलाफ एस्मा लगाने के लिए हाई कोर्ट ने कठोर आदेश पारित किया तब हड़ताल समाप्त हुई वर्ना सरकार का पसीना छूट गया था। अब सचिवालय की हड़ताल के मामले में उच्च न्यायालय का आदेश पारित करने सरकार को राहत तो दे गया लेकिन सवाल यही है कि आखिर सरकार निर्णय क्यों नहीं लेती।
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छठवें वेतनमान को पाने का आंदोलन हो या फिर नियमावली में शिथिलीकरण समय से पहले प्रमोशन पाने का मामला हो, वेतन बढ़ोत्तरी हो या फिर भत्ते पाने का प्रकरण, कर्मचारियों ने जो चाहा वो पाया। पिछले आठ दस सालों में कोई ऐसा मामला नहीं है जिसमें राज्य सरकार ने सख्ती बरती हो।
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सरकार हमेशा बैकफुट पर रही। प्रमोशन में आरक्षण को लेकर चली हड़ताल के मद्देनजर जिन कर्मियों को तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक जैन ने बर्खास्त किया उन्हें अगले ही दिन वापस ले लिया गया।

मुख्यमंत्री रहते रमेश पोखरियाल निशंक ने सचिवालय में निरीक्षण किया, एक अनुभाग अफसर गैर हाजिर मिलने पर सस्पेंड कर दिया गया, लेकिन तभी हड़ताल शुरू हो गई और रात होते होते निलम्बित अफसर को बहाल करना पड़ा।

खंडूड़ी ने सीएम रहते छठवें वेतनमान को लेकर निगमों के कर्मियों के लिए नीति बनाई कि जिस निगम की आर्थिक स्थिति ठीक है वह छठवां वेतनमान दे सकता है, लेकिन हड़ताल शुरू हो गई और जल्द ही घाटे वाले निगमों के कर्मियों को भी छठवें वेतनमान का लाभ मिला।

हड़ताल हुई और सरकार को झुकना पड़ा
सचिवालय में ही पिछले दिनों अनुभागों के साथ ही पदोन्नति के ज्यादा अवसर पैदा करने के लिए ढांचा पुनर्गठित कर उच्च स्तर के पद बढ़ाने के लिए हड़ताल हुई और सरकार को झुकना पड़ा।


सचिवालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मियों व चालकों के लिए झगड़ा कर वर्दी भत्ता लिया गया लेकिन एक भी कर्मी वर्दी में नजर नहीं आता। संविदा कर्मियों को स्थाई नौकरी देने के लिए इतनी बड़ी हड़ताल हुई कि सरकार को कायदे कानून बदलकर दस साल की संविदा की अवधि को पांच साल करना पड़ा।

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