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एक माह में खनन और शराब से ही जूझती रही उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार
संजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 18 Apr 2017 11:49 AM IST
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त्रिवेंद्र सिंह रावत
- फोटो : google
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प्रचंड बहुमत के साथ आस्तित्व में आई त्रिवेंद्र सरकार को आज एक महीना पूरा हो गया है। इन तीस दिनों में अगर सरकार किसी मोर्चे पर जूझती नजर आई तो वो रहा शराब और खनन।
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बड़ी अदालतों के फैसलों की काट कैसे निकले? इस पर मंथन करने में ही वह वक्त बीत गया, जिसमें सरकार को ‘फर्स्ट इम्प्रेसन’ की बात को चरितार्थ करना था। वहीं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जीरो टॉलरेंस के दावे की फजीहत सरकार के ही उन तमाम फैसलों ने कर दी, जिसमें दागी और विवादित छवि के लोगों को ऊंचे पदों पर बैठाया गया।
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भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ा जाने वाला धर्मयुद्ध केवल एनएच-74 घोटाले की सीबीआई जांच की सिफारिश तक ही सिमटकर रह गया। हैरानी की बात यह है कि पूर्व की सरकार में अपने कारनामों को लेकर चर्चा में रहने वाले तमाम भ्रष्ट अधिकारी आज भी मलाईदार कुर्सियों पर जस के तस जमे हैं।
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समीक्षा बैठकों का पता नहीं
परंपरा के अनुसार नवनियुक्त मुख्यमंत्री प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों के साथ एक औपचारिक बैठक करता है और उनके जिलों से जुड़े विभिन्न बिंदुओं पर लंबी चर्चा होती है। मगर यहां इस बैठक का अब तक कुछ पता नहीं। हां, प्रमुख अधिकारियों के साथ कालऑन मीटिंग जरूर हुई लेकिन विभागीय समीक्षा नहीं हुई। अपर सचिवों से उनके विभाग में चल रही योजनाओं की प्रगति की भी जानकारी करने की फुर्सत सरकार को नहीं मिली। कई मौकों पर ऐसा लगा कि जैसे राज्य की ब्यूरोक्रेसी सरकार को बड़े आराम से गुमराह कर ले रही है। विजन डॉक्युमेंट को दिखाकर वोट मांगने वाली भाजपा सरकार अपने वादे पूरे कैसे पूरे करेगी, इसका भी कोई रोडमैप अब तक देखने में नहीं आया।
कुछ फैसले जरूर रहे बेहतर
सरकार बनने के बाद कैबिनेट की बैठकों को व्यवस्थित करने का काम जरूर प्रसंशनीय रहा। प्रत्येक माह पहले और चौथे बुधवार को कैबिनेट की बैठक करने के अलावा बैठक में रखे जाने वाले प्रस्तावों को पहले परामर्शी विभाग जैसे न्याय, कार्मिक और वित्त से एप्रूव कराने की व्यवस्था संबंधी फैसले की सभी ने सराहना की। गौरतलब है कि पूर्ववर्ती सरकार में कैबिनेट की बैठक में रखे जाने वाले प्रस्तावों पर ऐसी कोई कवायद नहीं की जाती थी, जिसके चलते ज्यादातर फैसले अमल में आ ही नहीं पाते थे। इसके अतिरिक्त परिसंपत्तियों के बंटवारे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करना भी बेहतर रहा। इस मुलाकात से अरसे पुराने विवाद को समाप्त करने में बड़ी मदद मिलेगी।
सरकार का रिपोर्ट कार्ड...
सतपाल महाराज -: देशभर में पर्यटन और चारधाम यात्रा के लिए मशहूर उत्तराखंड के पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज की ओर से कोई नीतिगत फैसला इस पूरे महीने नहीं लिया गया। पार्टी में भारी-भरकम कद के महाराज को सीएम के बाद नंबर दो माना जाना है। हाल ही में महाराज ने टिहरी झील के विकास के लिए पूर्व की सरकार में जारी सौ करोड़ का टेंडर जरूर रद किया है।
प्रकाश पंत -: खनन, आबकारी, वित्त समेत तमाम महत्वपूर्ण महकमों के मंत्री प्रकाश पंत के खाते में हैं। मगर बीते एक महीने में केवल खनन और शराब के मुद्दे पर ही माथापच्ची हुई है। भ्रष्टाचार समाप्त करने के दावे के अलावा उनकी ओर से कोई नीतिगत फैसला लेने की बात सामने नहीं आई।
डॉ. हरक सिंह रावत -: वन, पर्यावरण और आयुष जैसे महकमों की जिम्मेदारी संभाल रहे कैबिनेट मंत्री हाल ही में लगी जंगल की आग जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी कुछ महत्वपूर्ण फैसला लेने की स्थिति में नहीं दिखे। कंडी रोड पर सक्रियता को छोड़ दें तो उनके अधीन विभागों में इस एक महीने में कोई हरकत नहीं हुई।
अरविंद पांडेय -: मिड-डे मील की गुणवत्ता बढ़ाने के मकसद से अक्षय पात्र संस्था को देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों का आवंटन किया गया है। ट्रायल के बाद अन्य जिलों में इसे आरंभ किया जाएगा। सीएसआर के तहत संसाधनविहीन प्राइमरी स्कूलों को बेहतर करने के लिए भी निर्देश दिए गए हैं। भ्रष्टचार पर जीरो टालरेंस का दावा, मगर फर्जी और अमान्य डिग्री के मामलों में कार्रवाई पर शिथिलता।
मदन कौशिक -: प्राधिकरणों में नक्शों को ऑनलाइन एप्लीकेशन करने का फैसला किया। साथ ही समय से निस्तारण के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की। अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम और मेट्रो ट्रेन को चलाने के लिए निर्देश देने की बात मदन कौशिक ने कही।
यशपाल आर्य -: पदभार संभालने के साथ ही यशपाल आर्य को समाज कल्याण की जिम्मेदारी मिली। इस महकमे में सौ करोड़ से ज्यादा का घपला चर्चा में था, जिसकी गंभीरता से जांच कराने के बजाए इसे दबाने के प्रयास ज्यादा हुए। इसके अलावा कोई महत्वपूर्ण फैसला यशपाल आर्य की ओर से नहीं लिया गया।
सुबोध उनियाल -: हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी का देहरादून स्थित कैंप आफिस समाप्त करके वीसी को पहाड़ों में बैठने का आदेश जारी कर करने के साथ ही ई-नैम (नेशनल एग्रीकल्चर मार्केटिंग) व्यवस्था को अमल में लाया गया। इसकी शुरुआत हरिद्वार की मंडी से की गई है। कुल पांच मंडियों को इसके तहत लाया जाएगा।
डॉ. धन सिंह रावत -: राज्य सहकारी बैंक में एमडी दीपक कुमार की नियुक्ति के फैसले के अलावा ‘उत्तराखंड में रहना तो वंदे मातरम कहना है’ जैसे विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहे धन सिंह रावत ने अपने मंत्रालयों में अब तक कोई सराहनीय फैसला नहीं लिया है।
रेखा आर्या -: पति के मुकदमों का ब्यौरा मांगने में डीएम के साथ विवाद को लेकर चर्चित रहीं राज्य मंत्री रेखा आर्या के स्तर पर भी किसी प्रमुख नीतिगत फैसले की खबर नहीं है। उनके पास बताने के लिए केवल निर्देशों की लंबी फेहरिस्त है और समीक्षा बैठकों का ब्यौरा है।