उत्तराखंड: लोकगायक और रंगकर्मी जीत सिंह नेगी का निधन, एचएमवी के लिए गीत रिकॉर्ड करने वाले थे पहले गढ़वाली गायक
- तू होली ऊंची डांड्यों मा वीरा..गीत से हासिल हुई थी पहचान
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
उत्तराखंड में गढ़वाल के प्रसिद्ध लोकगायक, रचनाकर, रंगकर्मी जीत सिंह नेगी रविवार को बेहद खामोशी के साथ दुनिया को अलविदा कह गए। 1947 में एचएमवी ने उनके गीतों को उन्हीं की आवाज में रिकॉर्ड किया था। जीत सिंह नेगी यह लोकप्रियता हासिल करने वाले पहले गढ़वाली लोक गायक थे।
‘तू होली ऊंची डांडी मा वीरा, घस्यारी का भेष मा..’ जैसे गीत से पहाड़ के वास्तविक रूप को उकेरने वाले जीत सिंह नेगी देहरादून में ही धर्मपुर में रह रहे थे। 1925 में पौड़ी जिले के अयाल गांव में जन्मे जीत सिंह नेगी ने एक नहीं कई विधाओं में रचनात्मकता का परिचय दिया। वे लोक कलाकार भी थे और रंगकर्मी भी। माधो सिंह भंडारी, रामी बौराणी, जीतू बगड़्वाल सहित अनेक कथाओं को उन्होंने रंगमंच में जीवंत किया।
जीत सिंह नेगी के गीतों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से भी लगाया जा सकता है कि 1947 में एचएमवी ने उन्हीं की आवाज में ‘तू होली ऊंची डांडी मा वीरा गीत को रिकार्ड किया था। खुद लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने उनके कई गीतों को आवाज दी है।
जीत सिंह नेगी के लिखे गीतों की व्यापकता इतनी है कि उन्हें गीतों का पुरोधा तक कहा गया। उनके गीतों में पहाड़ की हर छटा किसी न किसी रूप में मौजूद है। मिट्टी से जुड़े गीतों के लिए भी उन्हें जाना जाता है। खुदेड़ गीतों के साथ ही ‘हे दर्जी दिदा मेरी अंगणी बणे दे...’ जैसे गीत के जरिए जीत सिंह नेगी ने एक अलग अंदाज को भी प्रस्तुत किया।
जानकारों का कहना है कि वे गीतकार, संगीतकार, नाटककार होने के साथ ही वे बेहद सरल इंसान भी थे। खुद नरेंद्र सिंह नेगी ने जब उनसे उनकी रचनाओं को आवाज देने की पेशकश की तो गीतों के इस पुरोधा ने हामी भरने में कुछ क्षण भी नहीं लगाए।
तू होली ऊंची डांड्यों म वीरा धस्यारी का भेष मा,खुद मा तेरी सड़क्यों पर रोणु छों परदेश मा-जीत सिंह नेगी का यह गीत उनके खुदेड़ गीतों की पहचान भी बन गया। मुंबई में रचा गया यह गीत बाद में नरेंद्र सिंह नेगी ने भी गुनगुनाया। देहरादून में रह रहे जीत सिंह नेगी अचानक ही रविवार सुबह सबको अलविदा कह गए। रंगकर्मियों, संस्कृतिकर्मियों के साथ ही उनकी जान पहचान वाले लोगों के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था।
दिखना कम हो गया था
जीत सिंह नेगी वैसे पूरी तरह से स्वस्थ थे। उन्हें बस दिखना कम हो गया था और इस वजह से वे दुखी भी रहते थे। यह कहना है जीत सिंह नेगी के बेटे ललित सिंह नेगी का। ललित सिंह नेगी के मुताबिक पिता जीत सिंह नेगी दो साल पहले तक सामाजिक रूप से भी खासे सक्रिय थे।
मेरी प्यारी बोई, 2004 में मेरी ओर से निर्देशित फिल्म के सारे गीत जीत सिंह नेगी ने ही लिखे थे। उनके नाटक भारी भूल में पहली बार लड़की का रोल भी लड़की ने किया था। मेरे पिता मनोहर धस्माना ने उस नाटक में नायक की भूमिका अदा की थी। वे फूहड़पन के विरोधी लेकिन आधुनिकता के पक्षधर थे। उनकी कमी अब हमेशा खलेगी।
- मुकेश धस्माना, गढ़वाली फिल्म निर्देशक
गढ़वाली गीतों के पुरोधा जीत सिंह नेगी को माधो की कूल, रामी बौराणी सहित अन्य कई नाटकों के लिए भी जाना जाता है। उनका जाना हतप्रभ कर गया।
-सूर्यकांत धस्माना, कांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष
गढ़वाल के गीतों का पुरोधा नहीं रहा। जीत सिंह नेगी के निधन से रिक्त हुए स्थान की पूर्ति नहीं हो सकती। मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
-किशोर उपाध्याय, पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष