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उत्तराखंड सत्ता संग्राम 2022: कांग्रेस के लिए उपजाऊ रही है उत्तराखंड की सियासी जमीन, पढ़ें खास रिपोर्ट

Sun, 28 Nov 2021 09:36 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून
विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sun, 28 Nov 2021 09:36 AM IST
सार

Uttarakhand Election 2022: उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान कांग्रेस की स्थिति कुछ ऐसी थी कि इसके नेता उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का नेतृत्व कर रहे रणजीत सिंह वर्मा सरीखे गैर कांग्रेसी नेता के साथ चलने को मजबूर थे।

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Uttarakhand Election 2022: political land of Uttarakhand has been fertile for Congress
स्व. एनडी तिवारी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

गोविंद वल्लभ पंत, हेमवंती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज नेताओं की समृद्ध विरासत वाली कांग्रेस के लिए उत्तराखंड के लिए सियासी उपजाऊ जमीन रही है। हालांकि कांग्रेस देश के दूसरे हिस्सों की तरह ही आपात काल के बाद कुछ वर्षों के लिए हाशिए पर चली गई थी, लेकिन फिर उसने नवगठित राज्य में जड़ जमा ली थी। आलम यह था कि गठन के बाद भाजपा की अंतरिम सरकार के बाद तत्काल हुए चुनाव में पार्टी ने विधानसभा चुनावों में बाजी मार ली थी। 

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रणजीत सिंह वर्मा सरीखे गैर कांग्रेसी नेता के साथ चलने को मजबूर थे कांग्रेसी
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान कांग्रेस की स्थिति कुछ ऐसी थी कि इसके नेता उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का नेतृत्व कर रहे रणजीत सिंह वर्मा सरीखे गैर कांग्रेसी नेता के साथ चलने को मजबूर थे। 1999 में जब उत्तरप्रदेश की भाजपा  सरकार विधानसभा में उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए संकल्प व बिल लाई, तब पृथक बनने वाले प्रस्तावित राज्य में कांग्रेस में हलचल शुरू हुई। वर्ष 2000 नवंबर आते-आते कांग्रेस में जान पड़ने लगी और राज्य गठन से ठीक पहले विभिन्न वर्गों के लोग कांग्रेस में शामिल हुए और राज्य में पार्टी मजबूत होने लगी।
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राज्य में हुए पहले विधानसभा चुनावों में परिणाम जब आने शुरू हुए तो शुरुआती रुझान भाजपा के पक्ष में आते देखे। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत ने प्रेस के समक्ष हार स्वीकारते हुए हार की जिम्मेदारी भी ले ली। लेकिन एक  घंटे में ही परिदृश्य बदल गया और कांग्रेस के 36 विधायक जीत गए। इसके बाद हरीश रावत के पक्ष में विधायकों का एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। लेकिन बाद में कुछ विधायकों ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष पेश होकर अपने हस्ताक्षर नकली होने की बात कह दी। इसके बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एनडी तिवारी विराजमान हो गए।

एनडी ने पूरे पांच साल सरकार चलाई। पार्टी ने हरीश रावत को राज्यसभा भेज दिया। वर्ष 2022 के चुनाव में कांग्रेस एक फिर केंद्र और राज्य के सत्तारोधी रुझान के दम पर चुनावी नैया पार लगाने की सोच रही है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, गैरसैंण, देवस्थानम बोर्ड और भू-कानून कांग्रेस के मुख्य चुनावी हथियार हैं। वर्ष 2017 के विस चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया था। पार्टी मात्र 11 सीटों पर सिमटकर रह गई थी।

नौ नवंबर 2000 को राज्य गठन के दौरान उत्तराखंड में अंतरिम विधानसभा में 30 सदस्य थे। इनमें यूपी के समय चुने हुए 22 विधायक और आठ विधान परिषद सदस्य थे। 22 विधायकों में 17 भाजपा के, एक तिवारी कांग्रेस का, एक बसपा और तीन समाजवादी पार्टी के थे। जबकि कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं था।

कांग्रेस को 2002 में पहली निर्वाचित सरकार बनाने का मौका मिला
14 फरवरी 2002 को पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर सरकार बनाई। भाजपा 19 सीटों पर सिमट गई। बसपा ने सात सीटें जीतीं, जबकि क्षेत्रीय दल यूकेडी भी चार सीटें जीतने में कामयाब रही।

वर्ष 2007 में बढ़ा कांग्रेस का वोट प्रतिशत, सरकार भाजपा ने बनाई
वर्ष 2002 में 26.91 प्रतिशत वोट के मुकाबले उसे वर्ष 2007 में 29.59 प्रतिशत वोट मिले। उसके वोट प्रतिशत में 2.68 का इजाफा हुआ। लेकिन वह 36 सीटों के मुकाबले 21 सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा 34 सीट लेकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।

2012 में पुन: सरकार बनाई, दिए दो-दो मुख्यमंत्री
2012 के विधानसभा चुनाव में भी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा 31 सीटों पर सिमट गई तो कांग्रेस 32 सीटें लेकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। शुरुआत में विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने, लेकिन वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के बाद राज्य में सत्ता की बागडोर हरीश रावत को मिल गई। अंतर्कलह से जूझ रही पार्टी में वर्ष 2016 में नौ विधायकों ने बगावत कर दी और वह भाजपा में शामिल हो गए। रावत ने किसी तरह से कोर्ट की शरण लेकर सरकार बचाई।

2017 में मोदी की आंधी में बह गई कांग्रेस

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी की आंधी कांग्रेस को ले डूबी। जहां भाजपा ने 57 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई, वहीं कांग्रेस महज 11 सीटों पर सिमट गई। यह उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था। हालांकि उसके वोट प्रशित में बहुत ज्यादा अंतर नहीं पड़ा। इस बार भी पार्टी का वोट प्रतिशत वर्ष 2012 में 34.03 के मुकाबले 33.49 प्रतिशत रहा। यानि वोट बैंक के प्रतिशत में महज दशमलव 54 की कमी आई। इस चुनाव में कांग्रेस ने सबकी चाहत, हरीश रावत नारा दिया था। लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा होने के बावजूद वह दो-दो सीटों से चुनाव हार गए। देशभर की यह पहली राजनीतिक घटना थी, जब कोई मुख्यमंत्री ही दो-दो सीटों से हार गया।

हार-जीत के खेल में वोट बैंक पर नहीं पड़ा बहुत ज्यादा असर 
वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 36 सीटें मिलीं। जबकि पार्टी को वोट प्रतिशत 26.91 रहा। दूसरे विधानसभा चुनाव 2007 में पार्टी को 21 सीटें मिलीं, जबकि पार्टी का वोट प्रतिशत 29.59 रहा। तीसरे विधानसभा चुनाव 2012 में पार्टी को 32 सीटें मिलीं, जबकि उसका वोट प्रतिशत 34.03 रहा। चौथे विधानसभा चुनाव 2017 में पार्टी 11 सीटों पर सिमट गई, लेकिन उसके वोट प्रतिशत में कोई खास असर नहीं पड़ा। तब भी पार्टी का वोट प्रतिशत 33.49 रहा।

तब हरक ने पीसीसी में इंदिरा के पक्ष और हरीश के विरोध में लगाए थे नारे
राज्य बनने के बाद जब कांग्रेस की उत्तराखंड शाखा का गठन होने की प्रक्रिया शुरू हुई तो कांग्रेस के चार दिग्गज अध्यक्ष पद के लिए मैदान में कूद पड़े। इनमें दो इंदिरा हृदयेश और सतपाल महाराज तो एनडी तिवारी गुट के माने जाते थे और  हरीश रावत व विजय बहुगुणा का अपना वर्चस्व था। चारों के संघर्ष में अंतिम लड़ाई इंदिरा हृदयेश व हरीश रावत के बीच सिमट गई।

अन्तोगत्वा जब पीसीसी अध्यक्ष के लिए नामांकन दाखिल होने थे, उसकी पूर्व संध्या पर दिल्ली दरबार का संदेश लेकर इंदिरा हृदयेश नामांकन के लिए देहरादून पहुंच गईं। देहरादून के तमाम उन नेताओं ने जो टिकट और पद के लिए आतुर थे इंदिरा हृदयेश के बैनर पोस्टर राजधानी देहरादून में चस्पा कर दिए। लेकिन अगले दिन जब नामांकन होना था, तब हरीश रावत अपने लाव लश्कर के साथ दिल्ली से देहरादून नया फरमान लेकर आ गए।

डॉक्टर इंदिरा हृदयेश अध्यक्ष बनते-बनते रह गई। दोपहर जब चुनाव पर्यवेक्षक पूर्व सांसद जेपी अग्रवाल ने हरीश रावत को अध्यक्ष घोषित किया तो इंदिरा के समर्थक हरक सिंह रावत ने कांग्रेस दफ्तर में इंदिरा के पक्ष में व हरीश रावत के विरोध में नारे लगाए। जिससे कुछ देर के लिए वहां माहौल गरमा गया। तब प्रदेश अध्यक्ष न बनने से नाराज इंदिरा हृदयेश को पार्टी ने दो विधायकों वाले सीएलपी का नेता बना दिया था। इस नाते वे पार्टी की नीति निर्धारक सभी कमेटियों की सदस्य बन गईं और तभी से अंतिम सांस तक उनका हरीश रावत से 36 का आंकड़ा रहा।

यूपी विस चुनाव में पहाड़ में कांग्रेस का प्रदर्शन
चुनाव   -  कांग्रेस की सीटें     
1969     -        14   
1974     -        15
1977      -        01
1980      -       13
1985       -      16
1989       -       12
1991      -       03
1993      -       05
1996      -       0
कुल सीटें -     22

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