लालच में पहाड़ चढ़ने को बेताब 'भगवान'
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रुपयों के लालच में उत्तराखंड के डॉक्टर (भगवान) दुर्गम पहाड़ पर तैनाती की मांग कर रह हैं। हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में बतौर जूनियर रेजिडेंट (जेआर) एक साल के लिए संविदा पर तैनात होने वाले डॉक्टरों का कहना है कि 'हमें सुगम नहीं दुर्गम में पोस्टिंग चाहिए।'
डॉक्टरों की इस मांग से विभाग असमंजस में है। बताया जा रहा है कि इसके पीछे की वजह कम वेतन और काम का दबाव है। दुर्गम की मांग करने वाले डॉक्टरों की संख्या करीब 40 है। ये हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज से पासआउट हुए हैं।
सरकार ने फीस में रियायत लेने वाले चिकित्सकों की राज्य में अनिवार्य संविदा सेवा शर्तें बदली थीं। नई शर्तों के अनुसार पांच वर्ष की दुर्गम में तैनाती से मेरिट में अव्वल आने वाले छात्रों को एक वर्ष मेडिकल कॉलेज में जेआर के तौर पर सेवाएं देने का मौका मिलेगा।
इसके अनुसार हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज से पास 76 डाक्टरों में 40 की बतौर कालेज में बतौर जेआर और 33 को दुर्गम के अस्पतालों में तैनात करना है। पीजी में चयनित तीन छात्रों को तीन वर्ष की छूट दी गई है।
लेकिन जिन छात्रों को मेडिकल कालेज में बतौर जेआर तैनाती दी गई उन्होंने ज्वाइन करने से इंकार कर दिया। छात्रों के अड़ने से तैनाती प्रक्रिया रोक दी गई है। शासन को इसकी जानकारी दी गई है।
अगर मेडिकल छात्रों की समस्याएं तर्कसंगत हैं तो उनका समाधान निकाला जाएगा। लेकिन बांड की शर्तों को मानना अनिवार्य है।
- आरके सुधांशु, चिकित्सा शिक्षा सचिव
कम वेतन और काम ज्यादा का है डर
हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में जूनियर रेजिडेंट (जेआर) के रूप तैनात होने वाले करीब 40 डॉक्टरों ने पांच सालों तक दुर्गम में सेवा देने की इच्छा जताई है। इस इच्छा के पीछे मूल वजह वेतन कम और काम ज्यादा है।
हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में जेआर को लगभग 35 हजार रुपए मासिक मिलते हैं जबकि दुर्गम में तैनात डॉक्टर को 50 हजार रुपए से अधिक का वेतन है। इतना ही नहीं जेआर का वेतन चिकित्सा शिक्षा विभाग के तहत जबकि दुर्गम में तैनात होने वाले डॉक्टरों का वेतन स्वास्थ्य विभाग के अधीन आता है।
इसके अलावा दूसरा कारण वर्क प्रोफाइल भी है। कालेज में जेआर की ड्यूटी टाइम आन काल है, जबकि दुर्गम में कम काम होने से चिकित्सक पीजी की तैयारी कर सकते हैं। बताया जा रहा है कि छात्रों को जेआर के वेतन संविदा चिकित्सकों के समकक्ष करने का आश्वासन दिया है, बावजूद वह अड़े हुए हैं।
जनवरी 2015 में हुआ शर्तों में बदलाव
पुराने बांड पर फीस रियायत लेने वाले 50 फीसदी छात्र आज भी राज्य में अनिवार्य सेवाओं नहीं दे रहें हैं। जिसके चलते जनवरी में सरकार ने शर्तों में बदलाव किया था। पांच वर्ष की अनिवार्य सेवाओं वाले अनुबंध पत्र में मेरिट वाले छात्रों को केवल चार वर्ष पर्वतीय क्षेत्रों में अनिवार्य सेवाएं देने की शर्त रखी गई है।
पहला वर्ष उनको मेडिकल कालेजों में स्वीकृत जेआर के पदों के अनुरूप तैनाती रखी गई। इस आदेश को जनवरी 2015 से पूर्व जारी अनुबंध पत्रों में प्रभावी कर दिया।
सुगम में नौकरी, दुर्गम में नेकी
मुनस्यारी-जोहाड़ डॉक्टर एसोसिएशन से जुड़े युवा डॉक्टर अपने सेवाभाव से दूसरों के लिए मिसाल पेश कर रहे हैं। ये डॉक्टर दिल्ली-मुंबई और दूसरे स्थलों पर तैनात हैं।
साल में दो बार छुट्टियां लेकर पहाड़ के दूर-दराज के क्षेत्रों में जाकर जरूरतमंदों का इलाज करते हैं। अब पूर्व मुख्य सचिव डॉ. आरएस टोलिया ने मुख्य सचिव एन रविशंकर को पत्र लिखकर इस तरह का प्रयोग अन्य जिलों में शुरू करने का आग्रह किया है।
डॉ. मयंक पांगती की अगुवाई वाली डॉक्टरों की टीम पिछले कुछ सालों से इस काम को अंजाम दे रही है। एक बार गर्मियों में और दूसरी बार अक्तूबर-नवंबर में डॉक्टर मुनस्यारी के दूर-दराज के क्षेत्रों में पहुंचती है।
इस बारे में डॉ. टोलिया का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग से भी बात की जाएगी। अगर इस तरह का कोई मॉडल पूरे राज्य में सामने आता है तो दुर्गम क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य की समस्या का समाधान हो सकता है।
वैद्य बालेंदु भी जुड़े मुहिम से
इस मुहिम से देहरादून के प्रसिद्ध वैद्य बालेंदु भी जुड़ गए हैं। उन्होंने एसोसिएशन से मिलकर एनीमिया (रक्त की कमी) की बीमारी दूर करने का इरादा जताया है। उनके मुताबिक एनीमिया की सबसे ज्यादा शिकायत महिलाओं में है। पहाड़ में कृमि संक्रमण से भी यह बीमारी अधिक है। वैद्य बालेंदु ने दून स्कूल को भी इस मुहिम से जोड़ने की इच्छा जाहिर की है।