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उत्तराखंड के इस गांव में आपदा ने डाला डेरा

Fri, 03 Jan 2014 10:41 AM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 03 Jan 2014 10:41 AM IST
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uttarakhand disaster affected gaundar village

उत्तराखंड के गोंडार में आपदा के बाद देखकर यही लगता है कि इस गांव में आपदा ने जैसे डेरा ही डाल दिया हो।

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मद्महेश्वर घाटी के आखिरी गांव के वासी आपदा में अपनी खेती, आजीविका पूरी तरह गंवा चुका यह गांव छह माह से अंधेरे में है। कमाई के लिए दंडी-कंडी, घोड़ा-खच्चर के जरिए केदारनाथ धाम यात्रा पर पूरी तरह निर्भर रहने वाले 70 घरों वाले गोंडार की कमर आर्थिक रूप से पहले ही टूट चुकी थी।
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कुदरती कहर ने गांव के लोगों से 400 नाली खेती की जमीन और पांच घराट भी छीन लिए थे। घराटों से गांव को बिजली भी मिलती थी। आलम यह है कि आपदा के बाद से ही यह गांव अंधेरे में है।

सिर्फ चार घंटे निकलता है सूरज

ऊंची पहाड़ियों से घिरे गांव पर कुदरत की नजर पहले से ही टेढ़ी है। यहां सूरज दोपहर एक बजे निकलता है और पांच बजे डूब जाता है। बिजली से वंचित इस गांव में रोशनी सिर्फ चार घंटे ही रहती है। सोलर लाइटें भी चार्ज नहीं हो पातीं।

जरूरी सामान के लिए 15 किमी की दौड़

गांव की मुश्किलों का अंदाजा लगाइए। खड़ी चढ़ाई और उतराई वाले पहाड़ी रास्तों से गुजर कर रांसी (आखिरी सड़क) से मैं छह किमी का पैदल रास्ता तय करके गोंडार तक पहुंच पाया। कोई बीमार हो तो डाक्टर का क्लीनिक भी छह किमी दूर रांसी में है।

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अस्पताल के लिए तो 20-25 किमी ऊखीमठ जाना होगा। यही बात जरूरी सामानों के लिए। कोई सामान लेना है तो 15-25 किमी का चक्कर लगाना होता है।

घराट तो सारे बह गए। अलबत्ता, एक डीजल से चलने वाली चक्की चल रही है। चक्की वाला पांच रुपया प्रति किलो अनाज की पिसाई ले रहा है। इसे भी लोग गनीमत मानते हैं।

गांव में प्राइमरी और मिडिल स्कूल एक मास्टर के सहारे
गांव के करीबन 50 बच्चे प्राइमरी और मिडिल स्कूल में पढ़ते हैं। दोनों में एक-एक मास्टर तैनात है। गांव वाले बताते हैं कि उन्होंने पारी बांध ली है। दो महीने एक रहता है तो दो महीने दूसरा। बच्चे क्या पढ़ाई करते होंगे समझा जा सकता है।

हमें छानियों में बसने की इजाजत मिले
गांव के प्रधान भगत सिंह बताते हैं कि सबसे बड़ी चिंता अगली बरसात की है। राहत-मुआवजे की बात छोड़िए सरकार हमें उन्हीं छानियों में बरसात के दौरान रहने की इजाजत दे जहां हम रहे थे, यही बड़ा अहसान होगा।

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गांव के पूर्व प्रधान आलम सिंह कहते हैं कि गांव के लोगों की परेशानी यह है कि उनकी आजीविका के साधन खत्म हो गए हैं। यात्रा में ही लोगों को आमदनी होती थी जो इस बार नहीं हुई। बरसात के अगले सीजन में क्या होगा, यह सोचकर सबकी जान सूखी हुई है।

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