Uttarakhand Avalanche: उत्तरकाशी हिमस्खलन से ताजा हो उठीं बछेंद्री पाल की यादें, बोलीं- मेरे आंसू नहीं थम रहे
उत्तरकाशी हिमस्खलन में फंसे पर्वतारोहियों के साथ जो हुआ उसने माउंट एवरेस्ट विजेता पद्मश्री बछेंद्री पाल को भी 1984 की याद दिला दी। उस दिन को याद कर वह सिहर जाती हैं। उन्होंने बताया कि मैं भी बर्फीले तूफान में फंसी थी और हिल नहीं पा रही थी।
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चमत्कार होते सुना है, उत्तरकाशी हिमस्खलन में फंसे पर्वतारोहियों के मामले में भी भगवान बस कोई चमत्कार हो जाए। माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला पद्मश्री बछेंद्री पाल अब ईश्वर से यही दुआ मांग रही हैं।
इस घटना ने बछेंद्री को उस दौर की याद दिला दी, जब वह 1984 में बर्फीले तूफान में फंस गई थीं।
पद्मश्री बछेंद्री पाल उस दिन को याद कर वह सिहर जाती हैं। वह बताती हैं, माउंट एवरेस्ट चढ़ते हुए उनका पर्वतारोही दल 24000 फीट की ऊंचाई पर एवलांच (हिमस्खलन) में फंस गया था। मैं भी बर्फीले तूफान में फंसी थी और हिल नहीं पा रही थी और सोच रही थी कि यह कैसी मौत है जब मैं होश में हूं और समझ रही हूं कि अब मुझे मरना है।
उन्होंने वो बुद्ध पूर्णिमा की रात थी। साढ़े बारह बजे थे, हम 8 से 10 लोग गहरी नींद में सो रहे थे तभी तेज धमाका हुआ। सोचा कैंप के बाहर ऑक्सीजन सिलिंडर फट गया है, लेकिन देखा कि वह किसी भारी चीज के नीचे दबी हैं। एवलांच ने टेंट को दबा दिया है। लोग रो रहे थेेेे, चिल्ला रहे थे, किसी के बचने की संभावना नहीं थी। मैं हिल भी नहीं पा रही थी। उत्तरकाशी में पर्वतारोहियों के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा यह सोचकर रोना आ रहा है। मैं खुशकिस्मत थी, मेरे सहयोगी ने चाकू से टेंट को काटा और बर्फ के टुकड़ों को हटाया।
देवी मां की कृपा थी जो मैं बच गई
एक टेंट बच गया था। उसमें कोई नहीं था। मैंने उस टेंट में जाकर पानी गर्म किया। किसी की पसली व हड्डी टूटी थी। किसी के सिर में चोट थी, किसी की टांग टूट गई, कुछ सदमें में थे। मेरे भी सिर में चोट थी, जिसे में बार-बार दबा रही थी, लेकिन अन्य की चोट देखकर लगा मेरी चोट कुछ नहीं है। यह एवलांच नजदीक से आया था, यदि दूर से आया होता तो कोई नहीं बचता। सोचा भगवान ने बचा लिया तो आगे बढ़ना है। इस सोच ने मुझे सकारात्मक ऊर्जा दी। अगले दिन सुबह पांच बजे सिलिपिंग बैग में लपेटकर घायलों को इलाज के लिए काठमांडू ले जाया गया। इस हादसे के बाद मुझे छोड़कर सभी लौट गए। देवी मां की कृपा थी जो मैं बच गई। मैंने चढ़ाई जारी रखी और एवरेस्ट फतह किया।
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ऑक्सीजन की कमी से लगने लगती है थकान
दस हजार फीट से ऊपर ऑक्सीजन कम हो जाती है और जल्दी थकान लगने लगती है। उत्तरकाशी के मामले में पर्वतारोही कितने नीचे दबे हैं इस पर निर्भर करता है। यहां प्रशिक्षण दिया जा रहा था, इसलिए उन लोगों के पास ऑक्सीजन सिलिंडर भी नहीं होंगे। उन्होंने यह भी बताया कि पर्वतारोही दल में कम लोग होते हैं। जबकि प्रशिक्षण में अधिक लोग शामिल होते हैं। यही वजह है कि इतने अधिक लोग प्रभावित हुए हैं।