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कोई लाश मिलते ही दौड़ पड़ते हैं कैबिनेट मंत्री मंजूर

Sat, 16 May 2015 06:30 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 16 May 2015 06:30 PM IST
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up minister shahid manzoor waiting for his daughter's body.

इंतजार करते-करते छह दिन बीत गए हैं। पथराई आंखों से यूपी के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर किनारे खड़े होकर एकटक बैराज को निहारते रहते हैं। जिस लाडली को गोद में बैठाकर हाथों से खिलाया वही बेटी बीते रविवार को गंगा में बह गई थी।

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मंजूर उस दिन मेरठ ही थे। खबर मिलते ही सीधे ऋषिकेश पहुंचे और तब से एक बार भी घर नहीं गए। घर जाएं भी तो कैसे, तब से मंजूर रोज सुबह उठकर बेटी की लाश मिलने का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही कोई शव मिलता है दौड़ पड़ते हैं कि कहीं बेटी तो नहीं मिल गई। रविवार को ही उनकी पत्नी भी आ गईं थी और तब से वे भी वापस नहीं गईं।
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रहने को तो लगभग पूरा परिवार साथ होता है पर उन सबके बीच शाहिद अलग-थलग दिखाई देते हैं। उ.प्र. सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं तो दिन भर मिलने वाले पहुंचते रहते हैं। सबसे मिलते  हैं लेकिन किसी से कोई बात नहीं करते। बस अभियान पर संतोष जताकर चुप हो जाते हैं।

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पांच दिन से बैराज पर रोज आ जाते हैं सुबह-सुबह

up minister shahid manzoor waiting for his daughter's body.

अदीबा की तलाशी का अभियान बुधवार से बैराज तक  शुरू कर दिया गया। बैराज के सामने सिंचाई विभाग के गेस्ट हाउस में शाहिद मंजूर अपने परिवार के साथ ठहरे हुए हैं। रोज सुबह उठकर बैराज के सामने खड़े हो जाते हैं और चुपचाप अभियान को देखते रहते हैं। दो दिनों में बचाव दल को दो शव मिले पर अदीबा का कुछ पता नहीं चला। कोई शव मिलता है तो लगता है कि कहीं बेटी तो नहीं, और सब दौड़ पड़ते हैं।

परिवार के एक सदस्य ने बताया कि पिछले छह दिनों से शाहिद मंजूर ने ठीक से खाना भी नहीं खाया है। सामने थाली आती है थोड़ा सा खाते हैं और थाली सरका देते हैं। अदीबा की मां का भी यही हाल है। हादसे के दिन से ही वे साथ हैं।

मंजूर कुछ देर बैराज के सामने खड़े रहने के कुछ देर बाद गेस्ट हाउस में जाते हैं लेकिन ज्यादा देर अंदर नहीं रह पाते। बाहर निकलकर फिर से रेस्क्यू को देखने लगते हैं। शाम को अभियान बंद होने के साथ ही सब ठहर जाता है और फिर से शुरू हो जाता है अगली सुबह का इंतजार।

लाश को ऊपर लाने के लिए घुमा रहे हैं बोट

up minister shahid manzoor waiting for his daughter's body.

बैराज में काफी गहराई तक पानी होने के साथ ही नीचे बड़े पत्थर और पेड भी हैं। इसके अलावा पानी मटमैला है और कुछ दिखाई भी नहीं देता जिससे पानी केअंदर उतरने में खतरा है। इसलिए बोट से कांटा फेककर खोजा जा रहा है।

रेस्क्यू में लगे एनडीआरएफ के एक जवान ने बताया कि कई बार लाश हल्का सा झटका पाने के बाद पानी के ऊपर आ जाती है। इसकेलिए बोट को पानी में एक क्षेत्र विशेष में जोर-जोर से घुमाया जाता है ताकि प्रेशर पड़ने से लाश ऊपर आ जाये।

...तो ऊपर की तरफ चलाया जाएगा रेस्क्यू
रेस्क्यू अभियान में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना के गोताखोर लगे हुए हैं। एनडीआरएफ के इंस्पेक्टर विनीत पाठक ने बताया कि आमतौर पर पांच से छह दिन में लाश बाहर आ जाती है। एक दो दिन तक अगर लाश नहीं मिलती है तो अभियान को नदी के ऊपरी चट्टानी इलाके में चलाया जाएगा।

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