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बयान में देरी बड़ी मछलियों को बचाने की कोशिश तो नहीं

Tue, 07 Apr 2015 12:06 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 07 Apr 2015 12:06 PM IST
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trying save academy officers in fake ias case,.

लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में फर्जी आईएएस बनकर छह माह तक रही रूबी चौधरी के मजिस्ट्रेटी बयान दर्ज करने में देरी पुलिस पर संदेह बढ़ा रही है। कानूनविदों का कहना है कि बयान में जितनी देरी होगी, असल आरोपियों को रूबी पर दबाव बनाने के उतने मौके मिलते रहेंगे।

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जानकार बयान से पहले रूबी को रिमांड पर लिए जाने को भी गलत मानते हैं। उनका कहना है कि रिमांड के दौरान ‘खेल’ हो सकता है।

कानूनविद मानते हैं कि रूबी के मजिस्ट्रेटी बयान के बाद रूबी को रिमांड पर लिया जाता तो मामले में अन्य आरोपियों पर सीधे शिकंजा कसता। उनका कहना है कि ऐसा संभव ही नहीं है कि प्रशासनिक अकादमी में रूबी छह माह तक बिना किसी की शह के रही हो।

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रिमांड के दौरान बनाया जा सकता है दबाव

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वरिष्ठ अधिवक्ता शिव चरण सिंह रावत बताते हैं कि अक्सर 164 के बयान में देरी से यह माना जाता है कि बयान दर्ज कराने वाले को सिखा-पढ़ा दिया गया है। लेकिन यहां अति संवेदनशील मामला होने के बावजूद पांच दिन बाद भी रूबी के बयान नहीं लिए गए हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर तिवारी कहते हैं कि यह राष्ट्र सुरक्षा से जुड़ा मामला हो सकता है। बयान दर्ज कराने में हीलाहवाली नहीं होनी चाहिए थी।

अधिवक्ता आरपी पंत के मुताबिक बयान दर्ज होने से पहले रिमांड से मामला मनमुताबिक बनाया जा सकता है। हो सकता है कि कुछ लोगों को बचाने के लिए गुंजाइश तलाशी जा रही हो। अधिवक्ता सतेंद्र रावत बताते हैं कि पूरा मामला क्या है, यह 164 के बयान के बाद जांच से स्पष्ट होता।

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