दूसरों की अंगुली थाम बदली आदिवासी महिलाओं की जिंदगी
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उत्तराखंड में थारू क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं को पढ़ाई करने से रोका जाता था। पुरुष महिलाओं को डराते थे। बाहर निकलने की कोशिश पर भी लाठी-डंडे लेकर पीछे पड़ जाते।
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ऐसे में कई की पढ़ने की हसरत बिखर गई, तो कुछ ने अंगुली भर का सहारा पाकर 12वीं पास कर लिया। अब जागरूकता के लिए दूसरी महिलाओं को पढ़ाना शुरू कर दिया।
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घर में चूल्हा फूंकने वाली यह महिलाएं पारंपरिक पहनावे में ही बाहर निकलती हैं। बुधवार को दून में कार्यक्रम के दौरान मंच संभाला तो आत्मविश्वास से लबरेज उनके चेहरे सभी को गदगद कर गए।
तूझे क्या नेतानी बनना है?
ऊधमसिंह नगर के खटीमा ब्लॉक के थारू समुदाय की द्रौपदी बताती हैं, ‘साल भर की थी, जब पिता गुजर गए।
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मां ने दूसरों के बर्तन मांज कर पाला, लेकिन पढ़ाई नहीं करने दी। 18 की उम्र में शादी हो गई। सपना था कि पढ़ाई कर आगे बढूं। 2006 में महिला समाख्या ने क्षेत्र में साक्षरता कैंप लगाया। तब मैं पहली बार घर से बाहर पढ़ने निकली।
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आस-पड़ोस के लोग बोले, तुझे क्या नेतानी बनना है? पति रूप सिंह को भी भड़काया कि पत्नी बाहर निकलेगी तो तुझे आंखें दिखाएगी।
पति ने दिया साथ
मगर पति ने मेरा साथ दिया। मैंने ओपन स्कूल से एबीसी सर्टिफिकेट लिया। ओपन बोर्ड से ही 10वीं और 12वीं की।
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दिन के वक्त घर और खेत का काम निपटाती, रात में 10-12 बजे तक किताब छुपाकर पढ़ती। इस बीच मेरा बेटा हुआ।
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मैं उसे शॉल में लपेट बिना ठंड की परवाह किए निकल जाती। आखिरकार पढ़ाई पूरी कर आज 20 महिलाओं को पढ़ा रही हूं।
बहन को पाल, पढ़ाई में कुछ नहीं रखा
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मां ने कहा, छोटी बहन को पाल, पढ़ाई में कुछ नहीं रखा। मैं और बहन घर से बाहर भी निकलते तो आपस में लिपट कर।
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किसी आदमी को देख डर और बढ़ जाता फिर उल्टे कदम लौट आते। समाख्या से जुड़ने के बाद मैंने भी हिम्मत कर 12वीं तक पढ़ाई कर ली।
रिश्तेदारों को कर रही प्रोत्साहित
खटीमा के पुरनापुर पचपेड़ा क्षेत्र की पूनम देवी ने बताया कि घर वालों का जोर हमेशा चूल्हा-चौका पर ही रहा।आखिरकार मैंने पढ़ाई कर ली है। रिश्तेदारों को भी प्रोत्साहित करती हूं। इस वक्त पंद्रह महिलाओं को पढ़ा रही हूं।