Tokyo Paralympics: उत्तराखंड के मनोज सरकार ने बैडमिंटन में कांस्य पदक किया हासिल, बेहद संघर्षपूर्ण रहा है जीवन
Tokyo Paralympics: पैरा बैडमिंटन खेल की एसएल-3 श्रेणी के सेमीफाइनल मुकाबले में उत्तराखंड के मनोज सरकार को यूके (ग्रेट ब्रिटेन) के डेनियल बेथल ने बुरी तरीके से हरा दिया। इसके बाद मनोज सरकार ने कांस्य पदक के लिए जापान के देयसुख से मुकाबला किया।
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टोक्यो पैरालंपिक में उत्तराखंड के अर्जुन अवार्डी मनोज सरकार ने जापान के देयसुख को हराकर कांस्य पदक हासिल किया है। जिसके बाद से उनके घर-परिवार में जश्न और खुशी का माहौल है। उनके घर के बाहर बधाई देने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी है। वहीं मनोज सरकार की पत्नी रेवा सरकार ने बताया है कि रुद्रपुर आने से पहले मनोज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलेंगे।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने लिखा, शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रमोद भगत को गोल्ड और मनोज सरकार को ब्रॉन्ज मेडल जीतने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। पैरा ओलंपिक में भारतीय खिलाडियों के अभूतपूर्व प्रदर्शन से सम्पूर्ण देश गौरवान्वित है।
यूके (ग्रेट ब्रिटेन) के डेनियल से बुरी तरीके से हारे
पैरा बैडमिंटन खेल की एसएल-3 श्रेणी के सेमीफाइनल मुकाबले में उत्तराखंड के मनोज सरकार को यूके (ग्रेट ब्रिटेन) के डेनियल बेथल ने दो सेटों में 21-8, 21-10 के स्कोर से हरा दिया। इसके बाद मनोज सरकार ने कांस्य पदक के लिए जापान के देयसुख से मुकाबला किया।
देश और राज्य में खुशी की लहर
टोक्यो के योयोगी नेशनल स्टेडियम में चल रही पैरा बैडमिंटन प्रतियोगिता में मनोज सरकार ने युक्रेन के अलेक्जेंडर को आसानी से 2-0 से हराकर सेमीफाइनल मुकाबले के लिए क्वालीफाई किया था। सेमीफाइनल मुकाबला यूके के डेनियल बेथल के साथ हुआ।
डेनियल ने 21-8, 21-10 के स्कोर से मनोज सरकार को हरा दिया और अपना स्वर्ण पदक मुकाबले के लिए क्वालीफाई कर लिया। सेमीफाइनल मुकाबले में हार के बाद मनोज को थोड़ी निराशा तो हुई, लेकिन उन्होंने कांस्य पदक के लिए जापान के देयसुख के साथ मुकाबला किया व देश के नाम एक और पदक कर दिया। मनोज सरकार द्वारा मेडल प्राप्त करने के बाद देश और राज्य में खुशी की लहर है।
काफी मुश्किल भरा था बचपन का दौर
मनोज सरकार के कांस्य पदक जीतने के बाद पूरे प्रदेश में उनकी चर्चा है। पर एक वक्त ऐसा भी था जब उन्हें बैडमिंटन का रैकेट और शटल खरीदने के लिए दूसरों के घरों में पीओपी का काम करना पड़ता था। पैर कमजोर होने की वजह से घर वाले मना करते थे, लेकिन जुनून कुछ कर दिखाने का था, इसलिए हार नहीं मानी।
टोक्यो रवाना होने से पहले लखनऊ में प्रैक्टिस कर रहे मनोज सरकार से फोन पर उनकी तैयारियों को लेकर बातचीत शुरू हुई तो चर्चा उनके बचपन के दौर तक पहुंची। मनोज ने बताया कि बचपन का दौर काफी मुश्किल भरा था। 13 माह की उम्र में एक इंजेक्शन के बाद उनका एक पैर कमजोर हो गया। थोड़ा बड़ा हुआ तो मम्मी ने घर खर्च से किसी तरह बचाकर एक जोड़ी रैकेट लाकर दिया।
भाइयों के साथ आंगन में मम्मी की साड़ी बांधकर खेलने लगा। बड़ा होने के साथ शहर में होने वाले बैडमिंटन मैचों में जीत दर्ज करने लगा, जिससे हारा उसे अगली बार हराया। पर चोट लगने के डर से घर वाले खेलने नहीं देते थे। खेल के प्रति प्यार कब जुनून में बदल गया पता ही नहीं चला। यही वजह रही कि रैकेट और शटल के पैसे जुटाने के लिए घरों में पेंट, पीओपी से लेकर खेतों में मटर तक तोड़े।2003-04 में बेहतर खेलने के बावजूद चयन नहीं हुआ। निराश हुआ लेकिन हिम्मत नहीं हारी। 2007 में मौका मिला तो काशीपुर स्टेडियम में बैडमिंटन हॉल पहली बार देखा।
स्टेट सेलेक्शन अल्मोड़ा में हुआ तो पहले ही राउंड में बाहर हो गया। घर आकर प्रैक्टिस जारी रखी। अगले वर्ष राज्य स्तरीय ट्रायल में दूसरे दौर में बाहर हुआ तो लक्ष्य सेन के पिता डीके सेन मेरे पास आए और बोले जब तुम सामान्य खिलाड़ियों को हरा रहे हो तो दिव्यांग की श्रेणी में तो तुम धमाल मचा दोगे और देश के लिए खेलने का भी मौका मिलेगा। सेन सर ने गौरव खन्ना सर का नंबर दिया। इसके बाद मंजिल नजर आने लगी। बकौल मनोज सरकार डीके सेन ने दिखाई राह, कोच गौरव सर ने मंजिल तक पहुंचाया। हालांकि अभी एक ही मंजिल हासिल की है अभी सफर लंबा है।
मां को याद करके भावुक हुए मनोज
मैच जीतने के बाद अमर उजाला से हुई बातचीत में मनोज सरकार अपनी मां को याद करके भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि आज अगर मां होती तो वह बेहद खुश होतीं। मनोज को जब राष्ट्रपति ने अर्जुन अवार्ड दिया था तब वह मां और कोच गौरव खन्ना के साथ राष्ट्रपति भवन गए थे। मां को जब उन्होंने अवार्ड थमाया तो वह भावुक हो गईं थीं। मनोज ने वीडियो कॉल के जरिये अमर उजाला को भी बधाई, जिसने खबरों के जरिये उन्हें और उनके खेल को लोगों के दिलों तक पहुंचाया।