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बाघ सुरक्षा पर किस्मत ने बचाई इज्जत

Wed, 21 Jan 2015 03:58 PM IST
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 21 Jan 2015 03:58 PM IST
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tiger security in india.

उत्तराखंड में बाघों की संख्या बढ़ने पर सरकार और वन महकमा खुशी से झूम रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि इज्जत किस्मत से बची है।

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नहीं हो रहा बाघों का बेहतर संरक्षण

हकीकत यह है कि प्रदेश में न तो स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स (एसटीपीएफ) का गठन हो पाया है और न ही बाघ बहुल इलाकों में कोई और सुरक्षा व्यवस्था है। इसी का नतीजा है कि पिछले चार वर्षों में प्रदेश में 14 बाघ शिकारियों का निशाना बने। यह संख्या तो केवल पकड़े गए शिकारियों की है। बाकी जंगल में कहां क्या हुआ कोई नहीं जानता।

मंगलवार को आयोजित प्रेस वार्ता में वन मंत्री दिनेश अग्रवाल ने कहा कि बाघों के और बेहतर संरक्षण के लिए एनटीसीए से एक हजार करोड़ रुपए की मांग की जाएगी। यह बात अलग है कि एनटीसीए के निर्देशों के तहत एसटीपीएफ का गठन ही नहीं हुआ है।
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वर्ष 2009 में एनटीसीए ने 13 बाघ बहुल राज्यों में इस फोर्स के गठन के निर्देश दिए थे, जिसका पूरा खर्च एनटीसीए को ही वहन करना था। 2010 में उत्तराखंड सरकार ने इसके लिए शासनादेश भी जारी किया, लेकिन मामला फाइलों में खो गया। कर्नाटक, उड़ीसा और महाराष्ट्र में फोर्स का गठन हो चुका है।
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कार्बेट टाइगर रिजर्व में अतिक्रमण से भी बाघों का वासस्थल प्रभावित हुआ है, लेकिन महकमा कुछ नहीं कर पाया। स्थिति यह है कि कार्बेट के कई हिस्सों में शिकारी आसानी से घुस जाते हैं। वर्ष 2010 में एक, 2011 में एक, 2012 में तीन, 2013 में आठ और 2014 में एक बाघ को शिकारियों ने मार डाला।

इसके अलावा भारी मात्रा में बाघ की खाल, हड्डियां और अन्य अंग भी इन चार वर्षों में बरामद हुए। इसके बावजूद बाघों के कुनबे में बढ़ोत्तरी को चमत्कार ही कहा जा सकता है।

जंगलों में अतिक्रमण, प्रोटेक्शन फोर्स न होने के बावजूद बाघों की संख्या बढ़ी है तो यह केवल किस्मत है। प्रदेश सरकार या वन महकमा बाघों के प्रति कतई गंभीर नहीं है। -गौरी मोलेखी, सदस्य सचिव, पिपुल्स फॉर एनिमल संस्था

भरोसेमंद नहीं है गिनती का तरीका
देश में हर चाल साल बाद बाघों की गणना की जाती है। लेकिन, इसके लिए अपनाई जाने वाली तकनीक विदेशों के मुकाबले बेहद कमजोर है। देश में अभी तक ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिससे बाघों की सटीक संख्या का पता लगाया जा सके।

भारत में बाघ की गणना तीन चरणों में की जाती है। इसमें पहले पंजों के निशान लेने के बाद जीपीएस सिस्टम और फिर कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, विदेशों में अपनाई जाने वाली तकनीक ज्यादा बेहतर और हाईटेक है। कई देशों में रेडियो कॉलर तकनीक का इस्तेमाल होता है।

हर बाघ को एक रेडियोकॉलर लगाया जाता है, जिससे उसकी लोकेशन किसी भी वक्त पता चल जाती है। कंप्यूटर पर बैठकर उसकी लोकेशन के हिसाब से कुनबा बढ़ने पर नए बाघों को भी रेडियोकॉलर लगाया जाता है।

भारत में केवल मध्य प्रदेश में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर कुछ बाघों को रेडियो कॉलर लगाए गए थे। इसके बाद कहीं भी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। विदेशों में कुत्तों का इस्तेमाल भी बाघ गणना में किया जाता है। कई देशों में कैप्चर-रिकैप्चर तकनीक, प्रोफेशनल ट्रेंड टूरिस्ट और हाथी से बाघों की गणना की जाती है।

कैप्चर-रिकैप्चर के तहत न केवल बाघों की गणना होती है बल्कि डेमोग्राफिक पैमानों की भी जांच होती है। इसमें संरक्षित क्षेत्र का साइज, जैव विविधता, क्षेत्र में बाघ, बफर जोन से उनका जोड़ और स्थानीय समाज का सहयोग लिया जाता है। एक बार बाघ मिलने पर उसका पूरा फोटो, ड्राइंग, नर या मादा, लोकेशन सहित सभी जानकारियों का डाटा अध्ययन कैंप को भेजा जाता है।


औसत आधारित होते हैं आंकड़े

बाघों की गणना के बाद जारी होने वाले आंकड़े औसत आधारित होते हैं। रिपोर्ट में कम से कम और अधिक से अधिक संख्या का जिक्र करते हुए औसत निकाला जाता है।

जैसे कि 2010 में बाघों की कम से कम संख्या 1580 और अधिक से अधिक संख्या 1800 बताई गई थी। दोनों आंकड़ों का औसत निकालकर बाघों की कुल संख्या 1706 बताई गई थी। वन्य जीव प्रेमी इस तरीके पर सवाल उठाते रहे हैं।

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