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चार कहानियां, पढ़कर आप हंसे बिना नहीं रह सकेंगे

Tue, 23 Sep 2014 06:53 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 23 Sep 2014 06:53 PM IST
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three gossip of dehradun.

डीएवी कॉलेज के चुनाव में भी अजब हाल देखने को मिला। एक प्रत्याशी अपनी जीत की दुआएं कर रहा था। तभी एक छात्र उसके पास आया। लड़खड़ाती जुबान से जाहिर हो रहा था कि उसने शराब पी हुई थी। समर्थक नेताजी को उनका ही नाम लेकर बोला कि भाई वो जीतना चाहिए। अपना खास नेता है वो।

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चुनावी गणित में उलझे छात्र नेता को यह बात अजीब लगी। उसे समर्थक से पूछा कि आप जानते हैं क्या उन्हें। समर्थक ने फिर पूरे भरोसे के साथ जवाब दिया कि, हां हां अपना भाई है। उसे जिताना है। उसने फिर नाम पूछा तो भी समर्थक अपने नेता को नहीं पहचान पाया। बाद में नेता ने जब अपना नाम बताया तो नशेड़ी समर्थक का नशा काफूर हो गया। मौके पर खड़े लोग यह देखकर हंसने लगे।
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यही तो जवानी का राज है
डीएवी में मतगणना के दौरान एक शिक्षक महोदय कोने में बैठे नजर आए। उनके पास दो शिक्षिकाएं भी बैठी थी। तभी वहां पहुंचे किसी दूसरे शिक्षक ने चुटकी ली कि गुरुजी यहां बैठे क्या कर रहे हैं। तपाक से गुरुजी ने भी जवाब दिया कि थोड़ी देर के लिए टाइमपास कर रहा था।
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पूछने वाले ने भी तुरंत कहा कि अपनी उम्र का तो ख्याल करो। इस पर गुरुजी ने भी तुरंत जवाब दिया कि यही तो जवानी का राज है।

करू विधायक को छपास रोग है

three gossip of dehradun.

विधायक जी जनता के लिए करू विधायक माने जाते हैं। जनता-जनार्दन के लिए हर वक्त हाजिर। कोई भी समस्या हो, आधी रात पहुंच जाइए। साथ निकल पड़ेंगे। यह अलग बात है कि उनकी अफसरों के नक्कारखाने में कितनी सुनी जाए।

अब कर्मठता का आलम यहां तक आ पहुंचा है कि अगर किसी दिन कोई जरूरतमंद दरवाजे नहीं दिखाई देता तो अपने बाल-बच्चों, पड़ोसियों तक को बिठाकर बैठक का आयोजन दर्शा देते हैं।

मीडिया में छपने के इस कदर शौकीन भी हैं कि पीठ की तरफ से लिए गए फोटो मीडियाकर्मियों की मेल पर सरका देते हैं। उनके नजदीकियों, परिचितों ने कई बार उन्हें समझाया कि छपास रोग सही है, लेकिन ज्यादा फर्जीवाड़ा भी ठीक नहीं। पर नेताजी हैं कि मान नहीं रहे।

नजदीकियों को डर इस बात का है कि ज्यादा के चक्कर में कहीं, जो प्रचार मिल रहा है, उस पर भी पाबंदी न हो जाए। बहरहाल, नेताजी का काम चालू है। साथी भले नासमझ कहें तो कहें।

छोड़िये काम तो होता ही रहेगा

three gossip of dehradun.

एक पीसीएस अधिकारी के अंदर शायर छिपा है। वह लंतरानी के माहिर हैं। काम सबसे कम करते हैं लेकिन हाकिम की नाक के बाल हैं। जो फाइल उनके यहां पहुंच गई तो जानिये एलिस के वंडरलैंड में पहुंच गई।

फाइलों के ढेर में शहर के एक धन्ना सेठ की फाइल भी दबी हुई थी। जब दो महीने से ज्यादा वक्त गुजर गया तो सेठ ने हाकिम को फोन किया।

हाकिम ने फाइल ढुंढ़वानी शुरू की। पता चला कि साहब के टेबल पर ढेर में फाइल है। बाबू हड़बड़ाया हुआ पहुंचा और कहा कि हाकिम फाइल मांग रहे हैं जल्दी पूरी करके दे दो।

फाइल पर काम शुरू ही किया क‌ि उनके एक मित्र आ गए। मित्र ने आते ही उनकी कविता की एक लाइन पढ़ी तो वह रुक गए। अबे अभी तक मेरी कविता याद है। मित्र ने पूरी कविता सुनाई तो साहब गदगद हो गए।

साहब बताने लगे कि उन्होंने अपनी कविता में जो बिंब डाले हैं, उनके पहले निराला जी ने अपनी कविता इस्तेमाल किए थे। तभी बाबू बोला साहब फाइल। वह बिगड़ गए जाओ चाय लेकर आओ, काम तो होता ही रहेगा।

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