तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर चुका है ट्रिब्यूनल
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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान इस मसले से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खबर आई है। क्षेत्रीय आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल की बेंच सेना से जुड़े एक मसले में सुनवाई के बाद दिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय में तीन तलाक को पूर्व में ही असंवैधानिक घोषित कर चुकी है।
बेंच का यह फैसला ट्रिब्यूनल की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। फैसले में साफ किया गया है कि मुस्लिम समाज में विवाह एक समझौता माना गया है और किसी भी समझौते को एक तरफा निरस्त नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल के न्यायाधीश देवी प्रसाद सिंह ने यह जानकारी दी। मामले में सेनाध्यक्ष सहित वरिष्ठ सेनाधिकारियों को भी पक्षकार बनाया गया था।
न्यायमूर्ति सिंह और एयर मार्शल अनिल चोपड़ा की खंडपीठ ने 25 मई 2016 को तीन तलाक पर यह निर्णय देते हुए तीन तलाक को असंवैधानिक बताया और पति-पत्नी के अलग होने पर पति को मुआवजा देने का आदेश देते हुए मुकदमा याची के खिलाफ खारिज कर दिया। नैनीताल में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल में सुनवाई को पहुंचे ट्रिब्यूनल के जज सिंह ने बताया कि वे पूर्व में ही तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर चुके हैं।
यह है मामला
मामले के अनुसार आठ जाट रेजिमेंट के लांस नायक टेलर मो. फरुर उर्फ फारूक खान निवासी मोहनपुर जिला बरेली उत्तर प्रदेश में पोस्टेड थे। उनके प्रकरण में याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अंतर्गत पत्नी अर्से जहां को तलाक दिए जाने के बाद खाना खर्च और रखरखाव के लिए खर्चा देने संबंधी याचिका पर सुनवाई हुई थी। न्यायालय ने मामले में कहा कि आजाद भारत में सभी धर्मावलंबियों को आजादी से रहने की छूट मिली। इसमें महिलाओं और लड़कियों को भी बराबरी का अधिकार दिया गया था।
लांस नायक टेलर मो. फरुर उर्फ फारूक खान का अरसे जहां से 24 अक्टूबर 2009 को मुस्लिम विधि से निकाह हुआ था। किन्हीं कारणों से दोनों के बीच अनबन हो गई। मामले में भरण पोषण में कमी की मांग के खिलाफ याची फारूख खान ने याचिका दायर कर कहा था कि उसका तलाक हो गया है और अब उसे खर्चा भत्ता देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। न्यायालय ने इसे गलत मानते हुए याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने पीड़ित की रख-रखाव की मांग जायज मानते हुए उन्हें तीन माह में एरियर भी देने को कहा।
उन्होंने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी को मुंहजबानी तलाक नहीं दिया जा सकता है। यह संवैधानिक लोकाचार के विपरीत है। पर्सनल लॉ या भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं देता कि वह शादी जैसे समझौते को मुंहजबानी, नोटिस या किसी अन्य माध्यम से एकतरफा रद्द कर सके। इसलिए ऐसा किया जाना कानूनन गलत है। इस याचिका में ट्रिब्यूनल ने सेनाध्यक्ष, जर्नल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ, ऑफिसर इन चार्ज जाट रेजिमेंट, बरेली आवंला निवासी अरसे जहां और बरेली के एसीजेएम पंचम को भी पार्टी बनाया था।