फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   these villager know where sanjeevani found

यहां के बाशिंदे जानते हैं मरे हुए को जिंदा करने वाली संजीवनी बूटी का पता

Thu, 26 Jan 2017 11:51 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 26 Jan 2017 11:51 AM IST
विज्ञापन
these villager know where sanjeevani found
sanjeevani booti

जिस संजीवनी बूटी को तलाशने को दुनिया भर के विज्ञानी जुटे हुए हैं, उसके बारे में पता चला है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र के बाशिंदे संजीवनी समेत अन्य दुर्लभ जड़ी-बूटियों को पहचानते भी हैं और इनका प्रयोग भी जानते हैं।

विज्ञापन


बावजूद इसके जनजातीय परंपराओं को सहेजने और इनकी सुरक्षा के उद्देश्य से वे जड़ी-बूटियों से संबंधित अपना ज्ञान किसी के संग नहीं बांटते। एंथ्रोपॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के शोध के हवाले से ऐसा दावा किया जा रहा है।
विज्ञापन


एएसआई के सर्वे के दौरान उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सैकड़ों सालों से आबाद जनजातियों के लोगों से जब बात की गई तो कई पुरातन परंपराओं का पता चला।

यह राज घर का मुखिया अपने परिजनों को भी नहीं बताता

these villager know where sanjeevani found
संजीवनी की तलाश वैज्ञानिक

यह बताया गया कि जड़ी-बूटियों के पहचान का यह राज घर का मुखिया अपने परिजनों को भी नहीं बताता। जिसे दिलचस्पी होती है, वह पुरखों के नक्शेकदम पर चलकर खुद ज्ञान प्राप्त करता है। इन क्षेत्रों के सामाजिक ताने-बाने को कुरेदने पर इस संबंध में कई किवदंतियां भी सामने आईं।

शोधकर्ता और एएसआई के विज्ञानी डॉ. मानवेंद्र सिंह बर्तवाल का कहना है कि जनजातीय परंपरागत ज्ञान को संरक्षित करने के लिए लोग ऐसा करते हैं। समय बदला लेकिन यह परंपरा आज भी उसी तरह चली आ रही है।

उनका कहना है कि माणा, नीती, बंपा, गमसाली, रेणीलाता, द्रोणागिरि, हर्षिल आदि जगहों के लोग बेशकीमती अतिदुर्लभ हिमालयी जड़ी-बूटियों का ज्ञान रखते हैं। उन्हें संभवत: संजीवनी बूटी के बारे में भी ज्ञान है।

द्रोणगिरि क्षेत्र के लोग पवन सुत हनुमान से हैं नाराज

these villager know where sanjeevani found
dronagiri mount

संजीवनी बूटी के बारे में यह संकेत भी मिले हैं कि यह कोई एक अकेली जड़ी-बूटी नहीं, बल्कि जड़ी-बूटियों का समूह है। 

बर्तवाल कहते हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्र के बाशिंदे इन जड़ी-बूटियों का बेहतर प्रयोग भी जानते हैं और दूसरों को फायदा भी पहुंचाते हैं, लेकिन जड़ी का स्थान नहीं बताते और न ही उसकी पहचान करवाते हैं।

कई किवदंतियां रामचरित मानस के काल से जुड़ी हुई हैं। द्रोणगिरि क्षेत्र के लोग पवन सुत हनुमान की आज भी पूजा नहीं करते। वह संजीवनी के लिए पूरा द्रोण पर्वत उखाड़ ले जाने से खफा हैं।

जड़ी-बूटियों की पहचान गुप्त रखने की परंपरा भी शायद इसी दौरान की मानी जाती है। इस ज्ञान को हासिल करना तप माना जाता है। बर्तवाल कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि संजीवनी तक पहुंचने का रास्ता इन्हीं लोगों के बीच से निकलेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed