{"_id":"67e06c7067ef6d08090310ef","slug":"the-history-of-the-army-is-incomplete-without-general-rawat-dehradun-news-c-5-drn1037-647466-2025-03-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारतीय सेना का इतिहास जनरल रावत के बिना अधूरा : डॉ. सुरेखा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भारतीय सेना का इतिहास जनरल रावत के बिना अधूरा : डॉ. सुरेखा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय सेना का इतिहास जनरल बिपिन रावत के बिना अधूरा है। जनरल रावत का जीवन न सिर्फ सेना के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। ये बातें दून विवि की कुलपति डाॅ. सुरेखा डंगवाल ने कहीं।
वह दून विश्वविद्यालय में चल रहे डिफेंस लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन जनरल बिपिन रावत को समर्पित एक विशेष सत्र में संबोधित कर रही थीं। इस दौरान सैन्य कहानियों और भारतीय सेना के वीर योद्धाओं के जीवन पर भी चर्चा हुई। जनरल रावत के मामा कर्नल (सेनि.) सत्यपाल परमार ने उनके बचपन से लेकर सेना में भर्ती होने तक के प्रेरणादायक किस्से साझा किए। उन्होंने बताया कि जनरल रावत बचपन से मेधावी थे। एनडीए के साथ मेडिकल क्षेत्र में भी उनका चयन हुआ था, लेकिन उन्होंने सेना को प्राथमिकता दी। उनके मौसेरे भाई ब्रिगेडियर शिवेंद्र सिंह ने 1971 की लड़ाई का एक मार्मिक प्रसंग साझा किया।
उन्होंने बताया कि जब युद्ध में उनके पिता शहीद हुए, तो 13 साल के बिपिन रावत ने उन्हें गले लगाकर कहा था, हम मौसाजी को श्रद्धांजलि देंगे और फौज में जाएंगे। उन्होंने यह संकल्प सेना में अफसर बनकर निभाया। डोकलाम फेसऑफ का जिक्र करते हुए ब्रिगेडियर शिवेंद्र सिंह ने बताया कि जब चीनी सेना सामने थी तो जनरल रावत का दृढ़ संकल्प था कि हम दुश्मन को ठोकेंगे, पीछे नहीं हटेंगे।
विज्ञापन
इस दौरान बिपिन रावत के साथ हेलीकॉप्टर हादसे में जान गंवाने वाले ब्रिगेडियर एलएस लिड्डर की पत्नी गीतिका लिड्डर और ले़ कर्नल अजीत वी भंडारकार शौर्यचक्र की पत्नी शकुंतला भंडारकर ने भी अनुभव साझा किए।
-- -- --
सेना पर आधारित फिल्मों में रहती थी शोध की कमी : कुलप्रीत
फेस्टिवल में सेना से जुड़ी कहानियों को पर्दे पर उतारने और सैन्य जीवन को सही से प्रस्तुत करने पर भी संवाद हुआ। अभिनेता, निर्देशक और लेखक कमांडेंट कुलप्रीत यादव ने कहा, पहले सैन्य पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्मों में शोध की कमी रहती थी, लेकिन अब यह बदल रहा है। इस दौरान मेजर जनरल (सेनि.) देव अरविंद चतुर्वेदी ने भी विचार रखे।
-- -- -
हथियारों के स्वदेशीकरण पर दिया बल
एक अन्य सत्र में पूर्व भारतीय राजनयिक और आईडीएसए के महानिदेशक सुजन आर. चिनॉय ने कहा कि हम आज असल मायनों में आत्मनिर्भर भारत का सार्थक उदाहरण दुनिया में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे वजूद और मौजूदगी को आज कोई भी देश नकार नहीं सकता। उन्होंने भारत के हथियारों के स्वदेशीकरण की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा, युद्ध के दौरान विदेशी हथियारों पर निर्भरता हमें संकट में डाल सकती है।
-- -- -
सीमा पर खड़े जवानों से है डीआरडीओ का वजूद : डॉ. जोशी
डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. संजीव जोशी ने कहा कि आज भारत की ब्रह्मोस मिसाइल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा का विषय है। कहा, डीआरडीओ का वजूद सीमा पर खड़ेे जवानों की वजह से है, इसलिए यह संस्थान का कर्तव्य है कि हम उनकी सभी जरूरतों को पूरा करें। बताया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए सेमीकंडक्टर और अन्य रक्षा तकनीकों पर तेजी से काम हो रहा है।
-- -
विभिन्न सत्रों ने इन्होंने भी रखे विचार
प्रख्यात लेखिका रचना बिष्ट रावत ने पुस्तक 1971- चार्ज ऑफ द गोरखा एंड अदर्स स्टोरीज पर चर्चा की। तनुश्री पोद्दार की किताब मैन ऑफ स्टील पर भी विस्तृत चर्चा हुई। युवा लेखक दीपक सुराणा ने भी विचार रखे। इसके अलावा बलिदानी मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी की बेटियां नेहा और दीक्षा द्विवेदी ने अपनी पुस्तक नींबू साब: द बेयरफुट नागा कारगिल हीरो के माध्यम से कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरसे की प्रेरणादायक कहानी साझा की।
विज्ञापन
वह दून विश्वविद्यालय में चल रहे डिफेंस लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन जनरल बिपिन रावत को समर्पित एक विशेष सत्र में संबोधित कर रही थीं। इस दौरान सैन्य कहानियों और भारतीय सेना के वीर योद्धाओं के जीवन पर भी चर्चा हुई। जनरल रावत के मामा कर्नल (सेनि.) सत्यपाल परमार ने उनके बचपन से लेकर सेना में भर्ती होने तक के प्रेरणादायक किस्से साझा किए। उन्होंने बताया कि जनरल रावत बचपन से मेधावी थे। एनडीए के साथ मेडिकल क्षेत्र में भी उनका चयन हुआ था, लेकिन उन्होंने सेना को प्राथमिकता दी। उनके मौसेरे भाई ब्रिगेडियर शिवेंद्र सिंह ने 1971 की लड़ाई का एक मार्मिक प्रसंग साझा किया।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि जब युद्ध में उनके पिता शहीद हुए, तो 13 साल के बिपिन रावत ने उन्हें गले लगाकर कहा था, हम मौसाजी को श्रद्धांजलि देंगे और फौज में जाएंगे। उन्होंने यह संकल्प सेना में अफसर बनकर निभाया। डोकलाम फेसऑफ का जिक्र करते हुए ब्रिगेडियर शिवेंद्र सिंह ने बताया कि जब चीनी सेना सामने थी तो जनरल रावत का दृढ़ संकल्प था कि हम दुश्मन को ठोकेंगे, पीछे नहीं हटेंगे।
विज्ञापन
इस दौरान बिपिन रावत के साथ हेलीकॉप्टर हादसे में जान गंवाने वाले ब्रिगेडियर एलएस लिड्डर की पत्नी गीतिका लिड्डर और ले़ कर्नल अजीत वी भंडारकार शौर्यचक्र की पत्नी शकुंतला भंडारकर ने भी अनुभव साझा किए।
सेना पर आधारित फिल्मों में रहती थी शोध की कमी : कुलप्रीत
फेस्टिवल में सेना से जुड़ी कहानियों को पर्दे पर उतारने और सैन्य जीवन को सही से प्रस्तुत करने पर भी संवाद हुआ। अभिनेता, निर्देशक और लेखक कमांडेंट कुलप्रीत यादव ने कहा, पहले सैन्य पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्मों में शोध की कमी रहती थी, लेकिन अब यह बदल रहा है। इस दौरान मेजर जनरल (सेनि.) देव अरविंद चतुर्वेदी ने भी विचार रखे।
हथियारों के स्वदेशीकरण पर दिया बल
एक अन्य सत्र में पूर्व भारतीय राजनयिक और आईडीएसए के महानिदेशक सुजन आर. चिनॉय ने कहा कि हम आज असल मायनों में आत्मनिर्भर भारत का सार्थक उदाहरण दुनिया में प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे वजूद और मौजूदगी को आज कोई भी देश नकार नहीं सकता। उन्होंने भारत के हथियारों के स्वदेशीकरण की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा, युद्ध के दौरान विदेशी हथियारों पर निर्भरता हमें संकट में डाल सकती है।
सीमा पर खड़े जवानों से है डीआरडीओ का वजूद : डॉ. जोशी
डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. संजीव जोशी ने कहा कि आज भारत की ब्रह्मोस मिसाइल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चर्चा का विषय है। कहा, डीआरडीओ का वजूद सीमा पर खड़ेे जवानों की वजह से है, इसलिए यह संस्थान का कर्तव्य है कि हम उनकी सभी जरूरतों को पूरा करें। बताया कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए सेमीकंडक्टर और अन्य रक्षा तकनीकों पर तेजी से काम हो रहा है।
विभिन्न सत्रों ने इन्होंने भी रखे विचार
प्रख्यात लेखिका रचना बिष्ट रावत ने पुस्तक 1971- चार्ज ऑफ द गोरखा एंड अदर्स स्टोरीज पर चर्चा की। तनुश्री पोद्दार की किताब मैन ऑफ स्टील पर भी विस्तृत चर्चा हुई। युवा लेखक दीपक सुराणा ने भी विचार रखे। इसके अलावा बलिदानी मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी की बेटियां नेहा और दीक्षा द्विवेदी ने अपनी पुस्तक नींबू साब: द बेयरफुट नागा कारगिल हीरो के माध्यम से कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरसे की प्रेरणादायक कहानी साझा की।