टिहरी सीट पर रहा है इस राजघराने का दबदबा
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टिहरी संसदीय सीट पर भले ही कई बड़े दिग्गज चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन यहां राजघराने का ही दबदबा रहा है। जीत की यह कहानी राजमाता कमलेंदुमती शाह से शुरू होती है।
उन्हें देश की पहली निर्वाचित लोकसभा में टिहरी सीट से प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। इसमें भी उल्लेखनीय यह है कि इस सीट पर करीब चालीस वर्षों तक राजपरिवार के किसी न किसी सदस्य ने प्रतिनिधित्व किया।
पहली बार 1971 में कांग्रेस उम्मीदवार परिपूर्णानंद पैन्यूली ने निर्दलीय महाराजा मानवेंद्र शाह को परास्त कर टिहरी राजघराने का तिलिस्म तोड़ा था।
महाराजा मानवेंद्र शाह ने बनाई हैट्रिक
देश की पहली संसदीय सीट के रूप में टिहरी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से राजमाता कमलेंदुती शाह ने 1952 में जीत दर्ज की थी।
उसके बाद 1957, 62 और 67 के आम चुनाव में महाराजा मानवेंद्र शाह ने हैट्रिक बनाई। 1971 के चुनाव में कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिपूर्णानंद पैन्यूली को टिकट दिया तो महाराजा निर्दलीय मैदान में उतरे।
इस बार बाजी टिहरी जिले के ही मूल निवासी पैन्यूली के हाथ लगी। आपातकाल के बाद कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ। तब कांग्रेस ने देहरादून निवासी हीरा सिंह बिष्ट को मैदान में उतारा था। उन्हें हेमवंती नंदन बहुगुणा के सिपहसालार रहे त्रेपन सिंह नेगी ने परास्त किया।
टिहरी जिले के दल्ला गांव निवासी नेगी जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते। बाद में बहुगुणा के साथ वह भी कांग्रेस में शामिल हो गए और 1980 में दोबारा सांसद चुने गए। 1985 में कांग्रेस ने देहरादून निवासी ब्रह्मदत्त को टिकट दिया।
पहली बार किसी बाहरी को मिली सीट
पहली बार यह सीट टिहरी के बाहरी निवासी ब्रह्मदत्त के कब्जे में 1985 में गई थी। देहरादून निवासी ब्रह्मदत्त इस सीट पर कांग्रेस के टिकट पर जीते थे।
उसके बाद पौड़ी के मूल निवासी विजय बहुगुणा को भी दो बार इस सीट पर प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।
राजनीतिक कौशल में माहिर ब्रह्मदत्त ने पहली बार टिहरी जिले के मूल निवासियों की जीत का वर्चस्व तोड़ते हुए देहरादून की झोली में यह सीट डाली। वह दोबारा 1989 में भी चुनाव जीते। तब उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल के संरक्षक और टिहरी जिले के अखोड़ी गांव के निवासी इंद्रमणी बडोनी को दस हजार से भी कम मतों से पराजित किया था।
राजपरिवार ने फिर जमाया सीट पर कब्जा
लंबे राजनीतिक वनवास के बाद महाराजा मानवेंद्र शाह ने एक बार फिर संसदीय राजनीति में पदार्पण किया। 1991 में वह पहली बार भाजपा के टिकट पर लड़े और जीत हासिल करते हुए चौथी बार लोकसभा पहुंचे। उसके बाद वह लगातार चार बार जीते।
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उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में एक बार फिर इस सीट का प्रतिनिधित्व बाहरी हाथों में गया। तब विजय बहुगुणा ने जीत हासिल कर कांग्रेस की लगातार हार का सूखा भी समाप्त किया।
महारानी ने टिहरी का दबदबा रखा कायम
बहुगुणा ने 2009 के आम चुनाव में फिर जीत हासिल कर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाली। बहुगुणा के सीएम बनने के बाद रिक्त हुई सीट पर भाजपा ने महारानी राज्यलक्षी शाह को मैदान में उतारा।
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कांग्रेस ने विजय बहुगुणा के पुत्र साकेत बहुगुणा पर दांव खेला लेकिन वह हार गए। चुनाव में महारानी ने जीत दर्ज कर फिर टिहरी जिले का दबदबा एक बार फिर कायम रखा।