धरने में झलक रही सरकारी कार्यप्रणाली
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श्रुति तयाल
वंसत विहार देहरादून।
उत्तराखंड राज्य की कल्पना एक ऐसे पहाड़ी राज्य के सपने को लेकर बुनी गई थी जिसमें इसके पहाड़ी क्षेत्रों के विकास का मुद्दा बुनियादी सवाल था, लेकिन आज 13 साल पीछे मुड़कर देखते हैं, तो परिवर्तन के नाम पर इतना भर नजर आता है कि राजनीति सिमट गई और हमारे हाथ में कहने को अपना एक राज्य है।
राज्य के 13 सालों के इतिहास में बेतरतीब विकास के नाम पर नदियों का अवैध दोहन और सरकारी विकास के दावों के नाम पर आए दिन राजधानी से लेकर जिला मुख्यालयों और ब्लॉक मुख्यालयों तक में दर्जनों धरना प्रदर्शन असंतोष की कहानी कह रहे हैं।
कर्मचारी-अधिकारी सरकार के खिलाफ
आए दिन कर्मचारी-अधिकारी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन पर उतारू हैं जो काफी हद तक गलत भी है। जाहिराना तौर पर इसका सीधा असर सूबे की विकास दर पर पड़ रहा है, जिसका खामियाजा अंततः आम आदमी को ही भुगतना पड़ रहा है।
आए दिन के धरना प्रदर्शनो से सरकारी उपक्रमों समेत पब्लिक सेक्टर भी चरमराने लगा है, जो कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को प्रदर्शित करता है।
कार्यप्रणाली में बदलाव
सरकार को चाहिए कि जनता और सूबे के लिए अपने कार्यप्रणाली में बदलाव लाए और कर्मचारियों को भी लोकतान्त्रिक प्रणाली के दुरुपयोग से रोके। शायद तभी इस छोटे से राज्य की कल्पना साकार हो सकेगी।