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उत्तराखंड चुनाव में भाजपा की मजबूरी बन गया ये दंपति, आखिर क्यों?

Sun, 22 Jan 2017 02:17 PM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 22 Jan 2017 02:17 PM IST
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story of munna singh chauhan and madhu chauhan.
मुन्ना सिंह चौहान और मधु चौहान - फोटो : facebook

‘...तो परिवारवाद भाजपा की पॉलिटिकल मजबूरी है’ यह बात सियासी जानकार यूं ही नहीं कह रहे हैं। दरअसल मुन्ना चौहान, मधु चौहान और यशपाल आर्य, संजीव आर्य और ऋतु खंडूड़ी को टिकट देकर पार्टी ने इस पर मुहर लगा दी है। हालांकि सूची में मेयर चमोली का नाम सरप्राइज पैकेज की तरह है।

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दूसरी सूची में किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री की नहीं चली और बागियों को भी झटका लगा है। इससे एक बात साबित हो गई है कि पार्टी ने पहली सूची के बाद जारी बगावत को देखते हुए ऐसा किया है।
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भाजपा ने उत्तराखंड में बची अपनी छह विधानसभाओं सीटों पर एक बार फिर परिवार के दो लोगों को प्रत्याशी घोषित परिवारवाद पर पार्टी में चल रहे विरोध को और हवा दी है। यह अलग बात है कि इन दोनों सीटों पर पार्टी को चौहान दंपति को टिकट देने मजबूरी बन गया था। राज्य गठन के बाद से पार्टी चकराता सीट पर नहीं जीती है, जबकि वहां मुन्ना और उनकी पत्नी मधु दोनों ही कड़ी टक्कर देते रहे हैं।

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महाराज की पत्नी को टिकट नहीं

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सतपाल महाराज - फोटो : AmarUjala

भाजपा ने दूसरी सूची देर रात जारी की, जिसकी भनक प्रदेश की लीडरशिप को भी नहीं लगी। चौहान दंपति को टिकट देने में भाजपा ने अपने सर्वेक्षण को आधार बनाया, जिसमें किसी भी दूसरे दावेदार को मजबूत नहीं माना गया था।

विकासनगर से कुलदीप कुमार का मजबूत दावा खारिज कर दिया गया। धर्मपुर से पार्टी ने मेयर चमोली को तरजीह दी जबकि महानगर अध्यक्ष उमेश अग्रवाल के समर्थन में उतरी संघ की लॉबी नाकाम रही। धर्मपुर में पहाड़ी और मैदानी वोटों के समीकरण को साधने के लिए पार्टी ने दावेदार उमेश अग्रवाल का पता काट दिया गया।

हालांकि वर्ष 2012 में भी पार्टी ने प्रकाश सुमन ध्यानी को भी इसी समीकरण को साधने की कोशिश की थी, लेकिन तब यह दांव फेल हो गया था। रामनगर से सतपाल महाराज की पत्नी अमृता को टिकट नहीं देकर पार्टी ने यह संकेत दिया कि बागियों की हर बात नहीं मानी जाएगी। 

मुन्ना ‌चौहान और मधु का नहीं मिला विकल्प

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मुन्ना सिंह चौहान और मधु चौहान - फोटो : Facebook

चौहान दंपति को टिकट देने के लिए वर्ष 2002 से इन दोनों सीटों पर परिवार के दबदबे को आधार बनाया गया। दोनों सीटों पर कांग्रेस का दबदबा रहा है, जबकि भाजपा का बेहद कमजोर जनाधार है।

पार्टी से अधिक इन सीटों पर मुन्ना और उनकी पत्नी कामयाब रही। मुन्ना राज्य गठन से पहले चकराता से दो बार जीते भी हैं। भाजपा हर चुनाव में इन सीटों कभी पहले दो स्थानों पर नहीं, सिर्फ एक बार विकासनगर में मुन्ना भाजपा से जीते हैं। 

वर्ष 2002 में विकासनगर और चकराता से मुन्ना अपनी पार्टी यूजेपी से उतर कर फर्स्ट रनर अप रहे थे। विकासनगर में 58 वोट से कांग्रेस प्रत्याशी नवप्रभात से हारे, जबकि चकराता में प्रीतम सिंह से उनकी हार का अंतर 8 हजार रहा।

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मुन्ना सिंह चौहान और मधु चौहान - फोटो : AmarUjala

वर्ष 2007 में चकराता से मुन्ना की पत्नी मुध चौहान ने प्रीतम सिंह के खिलाफ निर्दलीय पर्चा भरा, लेकिन 3741 वोट से हारकर दूसरे नंबर पर रही, जबकि मुन्ना सिंह चौहान विकासनगर में भाजपा की टिकट से कांग्रेस के नवप्रभात से 5156 के अंतर से जीते।

वर्ष 2012 में मुन्ना ने भाजपा छोड़ चकराता से यूजेपी से नामांकन भरा, लेकिन प्रीतम सिंह से हार गए। वहीं विकासनगर में भाजपा ने कुलदीप को उतारा, जिन्हें दस हजार मतों से नवप्रभात के हाथों हार मिली थी।

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