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उत्तराखंड: सोंग नदी की सेहत का बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट से लगेगा पता, 36 स्थानों पर किया जाएगा अध्ययन

Wed, 04 Nov 2026 02:51 PM IST
Renu Saklani अमर उजाला न्यूज डेस्क, देहरादून
अमर उजाला न्यूज डेस्क, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Wed, 04 Nov 2026 02:51 PM IST
सार

उत्तराखंड में सोंग नदी की पारिस्थितिकी को समझने और उसके संरक्षण के लिए एक नया शोध शुरू किया गया है। नदी का पानी कितना साफ है और उसके आसपास का पर्यावरण किस स्थिति में है, इसका पता अब वहां रहने वाले जीवों से लगाया जाएगा।

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Song river health to be assessed through bioindicator project in Dehradun uttarakhand news in hindi
सोंग नदी - फोटो : संवाद

विस्तार

स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA) के तहत सोंग नदी क्षेत्र में बायो इंडिकेटर प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके जरिए नदी के पानी की गुणवत्ता और आसपास के पर्यावरण की स्थिति का पता लगाया जाएगा। इसके लिए नदी में और उसके आसपास रहने वाले जीवों का अध्ययन किया जाएगा। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक 'जी' डॉ. वीपी उनियाल के मार्गदर्शन में यह शोध होगा।

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शोध में जलीय कीड़े और उनके लार्वा, तितलियों, जंगली मधुमक्खियों, ड्रैगनफ्लाई, डेम्सलफ्लाई और पक्षियों का अध्ययन किया जाएगा। जलीय कीड़े और उनके लार्वा पानी में प्रदूषण की स्थिति का संकेत देते हैं। तितलियों और जंगली मधुमक्खियों से नदी किनारे की हरियाली और परागण की स्थिति का पता चलेगा। वहीं, ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई पानी की स्वच्छता और नदी किनारे के पर्यावरण की जानकारी देंगे। पक्षियों की प्रजातियों के अध्ययन से पूरी नदी घाटी की स्थिति समझने में मदद मिलेगी।

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36 स्थानों पर होगा सर्वे

यह अध्ययन सोंग नदी के उद्गम स्थल कद्दूखाल (टिहरी) से लेकर गंगा में उसके संगम स्थल तेहरी फार्म  तक करीब 80 किलोमीटर के क्षेत्र में किया जाएगा। इसके लिए नदी को ऊपरी, मध्य और निचले तीन हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से में 12 स्थायी स्टेशन बनाए जाएंगे। इस तरह कुल 36 स्थानों पर सर्वे होगा।

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नवंबर से अप्रैल के बीच दो चरणों में फील्ड वर्क किया जाएगा। इसमें मानसून के बाद और मानसून से पहले के मौसम में अध्ययन होगा। छह महीने के इस प्रोजेक्ट से सोंग नदी का एक विस्तृत डेटाबेस तैयार किया जाएगा। इससे प्रस्तावित सोंग बांध, खनन और शहरीकरण का नदी पर पड़ने वाला असर समझने में मदद मिलेगी। शोध के आधार पर नदी के संरक्षण के लिए नीतियां बनाने में भी मदद मिलेगी।

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