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प्रेमी युगल ने किसके खौफ में की मौत से ‘दोस्ती’
कुणाल दरगन/ अमर उजाला, हरिद्वार
Updated Wed, 18 Dec 2013 11:08 AM IST
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हरिद्वार में प्रेमी युगल द्वारा जिंदगी से हार मानकर मौत से दोस्ती करने पर कई सवाल खडे़ हो रहे हैं।
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परिजन प्रेमप्रसंग से अनभिज्ञ होने की बात दोहराते रहे। लेकिन, उनके कदम साबित करते हैं कि उन्हें किसी न किसी का खौफ अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। दोनों की मौत अपने साथ कई सवालों के उत्तर भी अपने साथ लेकर चली गई है।
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वेस्ट यूपी के प्रेमी युगल के अलग-अलग समुदाय से ताल्लुक रखते थे। परिजनों की मजहबी दीवार उनके मोहब्बत की चहारदीवारी न बन जाए शायद इसी बात का डर उन्हें सता रहा होगा। या फिर लोकलाज की परवाह थी ऐसे कई सवाल दोनों की मौत से अनसुलझे रह गए हैं।
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परिजन कहते हैं कि उन्हें प्रेम प्रसंग की भनक ही नहीं थी। ऐसे में विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता। तो फिर ऐसा क्या हुआ था कि प्रेमी युगल ने जिंदगी से हार मान ली। न सुसाइड नोट में जात-बिरादरी का जिक्र है न परिजनों को कटघरे में खड़ा किया।
फिर ऐसा क्या हुआ था जो वे जान देने से पीछे नहीं हटे। यह सवाल ही परिजनों को खाए जा रहा है।
काश, परिजनों पर भरोसा जताया होता
छात्र-छात्रा के लापता होने की जानकारी पाकर दोनों के परिजन बड़ी समझदारी और खामोशी के साथ मिलकर उनकी तलाश में जुटे हुए थे। मकसद बस एक ही था कि उनके बच्चे किसी तरह सकुशल मिल जाएं। लेकिन वे मिले भी तो कफन में लिपटे हुए।
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हरिद्वार में जिस तरह दोनों परिवार के लोग एक साथ गमगीन खड़े थे, ऐसा लग रहा था कि मानों एक ही परिवार में मौतें हुई हों। लगता है युवावस्था की दहलीज पर पहुंचे प्रेमी युगल को अपने परिजनों की समझदारी पर भरोसा नहीं था। मौके पर पहुंचा हर शख्स उनके इस कदम पर हैरान था।
भारी मात्रा में मिला कीटनाशक
प्रेमी युगल ने जान देने की ठानी हुई थी। कमरे से भारी मात्रा में मिला कीटनाशक यही बयां कर रहा है। कमरे से छह पाउच और दो शीशी बरामद हुई है। कई पाउच खुले थे। जबकि एक शीशी खाली थी। पुलिस की मानें तो छात्र-छात्रा ने संग-संग भारी मात्रा में कीटनाशक खा लिया था।
बैग में मिली यूनिफॉर्म
स्कूल यूनीफॉर्म में प्रेमी युगल फरार हुआ था। होटल के कमरे से मिले स्कूल बैग से यूनिफॉर्म, किताब और प्रश्नपत्र मिले हैं। माना जा रहा है कि प्रेमी युगल ने बाजार से कपडे़ खरीदकर यूनिफॉर्म उतारकर बैग में रख दी थी।
होटल में पहना सुहागिन का जोड़ा, भरी मांग
वे जीते जी शायद दांपत्य बंधन में बंधने की हसरत छोड़ चुके थे। इसलिए छात्रा ने होटल में ही सुहागन का जोड़ा पहना और अपनी मांग भर ली। होटल प्रबंधक राहुल के मुताबिक जब युगल यहां पहुंचा था तब छात्र की मांग में सिंदूर नहीं था।
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लेकिन सुबह जब वह चिल्लाती हुए कमरे से निकली तो उसकी मांग भरी हुई थी। हाथ में कड़ा और गले में मंगलसूत्र भी था। होटल मैनेजर ने छात्रा के कृत्रिम जेवरात पुलिस को सौंप दिए हैं।
दोनों के परिजन बोले, काश जिक्र किया होता
मंगलवार सुबह हरिद्वार पहुंचे प्रेमी युगल के परिजनों के होंठ सिले रहे। पूछने पर केवल बस यही बार-बार बोलते रहे कि काश एक बार जिक्र किया होता। प्रेम प्रसंग के संबंध में जानकारी होने की बात दोनों के परिवार वालों ने नकारा।
छात्र पेशे से काश्तकार इकलौता बेटा और पढ़ने-लिखने में मेधावी छात्र ने कक्षा दस में 85 प्रतिशत नंबर हासिल किए थे। छात्र के चाचा ने बताया कि घर से भागने से पहले वह घर आया था। घर से उसने पांच हजार रुपए लिए और बिना बताए कहीं निकल गया।
कुछ देर में उन्हें युगल के फरार होने की जानकारी लग थी। उसके बाद से वह दोनों को ढूंढते-ढूंढते 15 तारीख को हरिद्वार पहुंच गए थे। छात्र के चाचा ने बताया कि शंकराचार्य चौक के आसपास के होटलों को वह चेक नहीं कर पाए थे।
वे बस यही बोले कि काश एक बार उसने जिक्र किया होता तो तब शायद ऐसा न होता। छात्रा के चाचा ने भी कहा कि एक बार बेटी उनसे बात करके देख लेती। वह इसका कोई न कोई हल जरूर निकालते। लेकिन अब वह जीते-जी मार गई है। युगल के परिजनों ने प्रेम प्रसंग की जानकारी होने की बात से मना किया।
काश प्रबंधक ने आईडी पर दिया होता ध्यान
काश होटल प्रबंधक ने छात्र के स्कूल के आईडी कार्ड पर ध्यान दिया होता तो शायद प्रेमी युगल जिंदा होता। प्रेमी युगल बाइक पर सवार होकर यहां पहुंचा था। छात्र ने आईडी प्रूफ के तौर पर अपना स्कूल का आईडी कार्ड दिया था।
उसमें उसके कक्षा 12वीं के छात्र होने की बात साफ-साफ लिखी थी। पिता का मोबाइल नंबर भी दर्ज किया हुआ है। परिजन बार-बार यही कहते हैं छात्र के साथ एक लड़की होने पर यदि होटल प्रबंधक ने ध्यान दिया होता तो शायद दोनों बच्चे जिंदा होते। इधर, होटल स्वामी ने कहा कि परीक्षा देने के लिए छात्र छात्रा अक्सर साथ-साथ आते रहते हैं।
भावना आहत होने पर उठता है आत्मघाती कदम
भावनात्मक रूप से अपरिपक्व होने के कारण ही किशोरावस्था में आत्मघाती कदम उठाए जाते हैं। बच्चे आवेश की जद में होने के चलते परिणाम की परवाह भी नहीं करते है। मनोविश्लेषक डॉक्टर अजीत तोमर के मुताबिक बच्चे ऐसा कदम तब उठाते हैं जब वे बेहद आहत होते हैं।
उन्हें ऐसा कोई रास्ता नहीं सूझता है जिससे वे अपनी मन की पीड़ा बांट सके। मन अशांत होने के चलते बच्चे आवेशपूर्ण स्थिति में आ जाते हैं क्योंकि वे किसी भी मुद्दे को अपनी भावना से जोड़ लेते है। मनोविश्लेषक की माने तो बच्चों के व्यवहार को देखते समझते हुए उन्हें किसी भी आत्मघाती कदम उठाने से रोका जा सकता है।
ऐसे मामलों में परिवार का रोल बहुत महत्वपूर्ण होता है। परिवारों की मान्यताएं तेजी से समाप्त हो रही हैं। इस वजह से बच्चों का सामाजीकरण नहीं हो पा रहा है और वह अकेले ही अपने फैसले लेने लगे हैं। परिवारों को भी चाहिए कि ऐसे मामलों में बेहद संजीदगी से पेश आएं।
- डॉ. ज्योत्सना शर्मा, समाजशास्त्री