नवरात्रि 2021: आदि शंकराचार्य को उत्तराखंड में हुआ था माता शक्ति का अहसास, देवी से मांगी थी क्षमा
बदरी-केदार यात्रा मार्ग पर स्थित श्रीनगर क्षेत्र आदिकाल से यात्रियों की प्रमुख विश्राम स्थली रहा है। मात्र 32 वर्ष की आयु जीने वाले आदि गुरू शंकराचार्य भी बदरीनाथ जाते समय श्रीनगर में रुकते थे।
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न मंत्रं नो यत्रं तदापि च न जाने स्तुतिमहो, न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:। माता शक्ति से क्षमा प्रार्थना के लिए यह स्त्रोत (देवी अपराध क्षमापना स्त्रोतम) आदि शंकराचार्य ने उत्तराखंड के श्रीनगर में लिखा। अद्वैत वेदांत (भगवान ही सृष्टि का नियंता) को मानने वाले शंकराचार्य को श्रीनगर में अलकनंदा किनारे शक्ति (माता भगवती) का अहसास हुआ था। इसके बाद उन्होंने देवी अपराध क्षमापना स्त्रोतम की रचना की।
उनका मानना था कि ब्रह्म ही सत्य है, बाकी मिथ्या है।
बदरी-केदार यात्रा मार्ग पर स्थित श्रीनगर क्षेत्र आदिकाल से यात्रियों की प्रमुख विश्राम स्थली रहा है। मात्र 32 वर्ष की आयु जीने वाले आदि गुरू शंकराचार्य भी बदरीनाथ जाते समय श्रीनगर में रुकते थे। कहा जाता है कि शंकराचार्य शक्ति में विश्वास नहीं करते थे। वह अद्वैत को मानते थे। उनका मानना था कि ब्रह्म ही सत्य है, बाकी मिथ्या है। जीव और ब्रह्म अलग नहीं है। अहं ब्रह्मास्मि सूत्रवाक्य के साथ उन्होंने अद्वैत वेदांत दर्शन को जन्म दिया।
कहा जाता है कि आदि गुरू शंकराचार्य जब बदरीनाथ यात्रा पर आए, तो अस्वस्थ होने से वह श्रीनगर में अलकनंदा नदी किनारे बैठ गए। कमजोरी की वजह से वह बेहोश हो गए। कुछ देर बाद उनकी आंखें खुली, तो देखा कि कोई कन्या उन पर पानी के छींटे मार रही है।
देवी अपराध क्षमापना स्त्रोतम की रचना की
शंकराचार्य ने पीने के लिए पानी मांगा, तो कन्या ने कहा कि स्वयं ले लो। इस पर शंकराचार्य ने कहा कि मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं उठकर पानी पी लूं। जवाब में यह कह कर कि आप तो शक्ति में विश्वास नहीं करते हो, कन्याअंतर्ध्यान हो गई।
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शंकराचार्य समझ गए कि माता दुर्गा (शक्ति) उनकी परीक्षा ले रही थी। उन्होंने देवी से क्षमा मांगी। इसके बाद वह ठीक हो गए। बाद में उन्होंने माता शक्ति की प्रार्थना करते हुए देवी अपराध क्षमापना स्त्रोतम की रचना की।
शंकराचार्य श्रीनगर में हैजा से पीड़ित हो गए थे
गढ़वाल के इतिहास के जानकार कमल रावत बताते हैं कि यह भी मान्यता है कि शक्ति को मिथ्या मानने वाले शंकराचार्य श्रीनगर में हैजा से पीड़ित हो गए थे। तब उन्हें बियाबान स्थान (वर्तमान धोबीघाट) में एक कन्या ने रोजाना छाछ पिलाकर स्वस्थ कर दिया। शंकराचार्य को अहसास हुआ है कि शक्ति के बिना शरीर कुछ नहीं है। इसके बाद उन्होंने लगभग तीन माह तक रुक कर देवी से क्षमा याचना करते हुए एक-एक करके स्त्रोत लिखे।