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'बड़े बांधों का पहाड़ों पर नहीं कोई काम'
अमर उजाला, रुड़की
Updated Sat, 15 Feb 2014 11:44 PM IST
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उत्तराखंड में केदार घाटी की त्रासदी का दोष केवल मौसम पर नहीं मढ़ना चाहिए। इसके लिए मानव और शहरीकरण जिम्मेदार है। बेहतर जीवन के लिए हवा, पानी एवं भोजन की सुरक्षा महत्वपूर्ण है।
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यह बात पद्मश्री एवं हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजरवेशन आर्गेनाइजेशन (हेस्को) के चेयरमैन डा. अनिल जोशी ने आईआईटी में उत्तराखंड के विकास पर आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के शुभारंभ के मौके पर कही।
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छोटे बांध बनाने पर दिया जोर
डा. जोशी ने कहा कि पहाड़ों को हर कीमत पर बचाना होगा। उन्होंने छोटे-छोटे बांध बनाए जाने की पुरजोर वकालत की। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि बड़े बांधों का पहाड़ों पर कोई काम नहीं है।
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उन्होंने कहा कि पहाड़ों पर अल्ट्राटेक सीमेंट उद्योगों के विकास की साजिश रची जा रही है। उसे सफल नहीं होने दिया जाएगा। सेमिनार में विभागाध्यक्ष रश्मि गौड़, प्रोफेसर डीके नौड़ियाल, प्रो. डीके पॉल ने उत्तराखंड के विकास की महत्ता एवं आवश्यकता पर बल दिया।
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एनआईएच निदेशक डा. आरडी सिंह ने ग्लेशियर पिघलने एवं बरसात के जीवदायिनी जल के लाभ एवं अधिक प्रवाह के नुकसान से अवगत कराया।
उत्तराखंड में हाइड्रो पावर से भी विकास संभव
सेमिनार में आए मध्यप्रदेश योजना आयोग के प्रधान सलाहकार डा. राजेंद्र मिश्रा ने कहा कि पाश्चात्य मॉडल के आधार पर भारत का विकास उचित नहीं है। उत्तराखंड में भी भौगोलिक स्थिति के अनुसार विकास का मॉडल तैयार किया जा सकता है।
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उन्होंने बागवानी, फल व्यवसाय, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, टूरिज्म एवं माइक्रो हाइड्रोपॉवर के जरिए अर्थव्यवस्था की मजबूती की सलाह दी।
वाटरशेड मैनेजमेंट पर हो काम
उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश में वाटरशेड मैनेजमेंट के जरिए भूजल के बजाय सतही जल का उपयोग कृषि के लिए किया गया।
इसके अलावा पानी के समाधान के लिए नदी जोड़ों परियोजनाओं पर भी काम किया गया। जिसके चलते राज्य की कृषि विकास दर 18.89 प्रतिशत हो गई। जो देश में सबसे अधिक है। जबकि कई साल पहले तक यह पांच से छह प्रतिशत तक थी।
बिजली बेचकर नहीं सर्विस सेक्टर से कमाएं धन
पर्यावरणविद् भरत झुनझुनवाला ने कहा कि उत्तराखंड में आवासीय, उद्योग के अलावा बेचने के लिहाज से बिजली की आवश्यकता है। जितनी बिजली राज्य में पैदा हो रही है। वह आवासीय और उद्योगों के लिए पर्याप्त है। बिजली को बेचकर पैसा कमाने की बजाय उसकी पूर्ति राज्य को सर्विस सेक्टर से करनी चाहिए।
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इसमें एकेडमिक इंस्टीट्यूट, हॉस्पिटल आय के स्रोत हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि बड़े प्रोजेक्ट से पैसे कमाने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन वह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का ही काम कर रहा है।