धरती के ‘भगवान’ को सिर्फ कमाई का ध्यान
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आम आदमी जिन डॉक्टरों में भगवान देखता है, दरअसल उन्हें उसके दर्द से कोई वास्ता नहीं। उन्हें चिंता है तो सिर्फ मोटी कमाई की, जो पांच-छह घंटे सरकारी ड्यूटी ‘बजाने’ के बाद प्राइवेट प्रैक्टिस के जरिये उनकी जेबों को भारी करती है।
ऐसा न होता तो स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम, डॉक्टरों का इंतजार कर रहे, दवाओं के लिए तरस रहे पहाड़ पर जाने का नाम सुनते ही ये भगवान बिदक न जाते।
बिदकना भी ऐसा कि तबादला रोकने के लिए प्रमोशन लौटाने, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेेने के लिए भी तैयार। और रवैया ऐसा कि मरीजों की जान जाए तो जाए, डॉक्टर जमी-जमाई प्राइवेट प्रैक्टिस सरकारी नौकरी के लिए हरगिज नहीं छोड़ने वाले। नीचे दिए गए कुछ मामले इस बात की गवाही देते हैं।
ट्रांसफर पर दून अस्पताल के एक न्यूरो सर्जन ने नौकरी छोड़ वह अस्पताल ज्वाइन कर लिया, जहां वह प्राइवेट प्रैक्टिस करते थे। आज वह इस अस्पताल के संचालकों में शामिल हैं।
दून अस्पताल के ही एक वरिष्ठ ईएनटी सर्जन ने पहाड़ ट्रांसफर होने पर नौकरी छोड़ अपना अस्पताल खोल लिया। आज इस अस्पताल में ही उनके बेटे भी डॉक्टरी कर रहे हैं। (ये दोनों मामले राज्य गठन के आसपास के वर्षों के हैं)
संयुक्त निदेशक पद पर प्रमोशन के बाद दून अस्पताल के दस डॉक्टरों के ट्रांसफर हुए। लेकिन इनमें से चार ने मेडिकल आधार पर अपना तबादला रुकवा लिया। वे पहाड़ नहीं जाना चाहते।
प्रमोशन पाने वालों में शामिल दो डॉक्टर मेडिकल लीव पर चले गए। दो को देहरादून से इतना ‘प्यार’ है कि उन्होंने तबादला रोकने के लिए प्रमोशन छोड़ने का प्रत्यावेदन दे डाला। (ये दोनों मामले हाल में हुए प्रमोशन और नियमानुसार ट्रांसफर के हैं)
70 फीसदी डॉक्टर करते हैं निजी प्रैक्टिस
दून अस्पताल में 48 डॉक्टर तैनात हैं। सूत्र बताते हैं कि इनमें से करीब 70 प्रतिशत डॉक्टर निजी प्रैक्टिस करते हैं। इनमें से कुछ अपने घरों पर क्लीनिक चलाते हैं तो कुछ निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस करते हैं।
सरकार देती है अतिरिक्त भत्ता
सरकारी डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस से रोकने के लिए सरकार उन्हें अतिरिक्त भत्ता देती है। यह भत्ता नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस (एनपीए) कहा जाता है। डॉक्टरों को मूल वेतन की 25 फीसदी रकम एनपीए के तौर पर दी जाती है।
1.5 लाख पाते हैं तनख्वाह
सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों की तनख्वाह मल्टीनेशनल कंपनियों के अधिकारियों के बराबर होती है। जानकारी के मुताबिक औसतन सरकारी अस्पताल के डॉक्टर को प्रतिमाह 1.20 लाख वेतन मिलता है।
मूल वेतन का 25 फीसदी और अन्य भत्ते जोड़कर यह राशि एक लाख 40 हजार रुपए प्रतिमाह हो जाती है।
प्राइवेट प्रैक्टिस से दोगुना लाभ
सूत्र बताते हैं कि निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों की कमाई लगभग दोगुनी हो जाती है। बड़े अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों को बेहतरीन पैकेज दिया जाता है।
जबकि घरों में चल रहे क्लीनिकों में भी डॉक्टर मनमानी फीस वसूलते हैं। सूत्रों के मुताबिक प्राइवेट प्रैक्टिस से ही डॉक्टर एक से डेढ़ लाख रुपए प्रतिमाह अतिरिक्त कमाई कर लेते हैं।
गए तो कैसे कटेगी चांदी
सूत्र बताते हैं कि दून में हर तरह के डॉक्टर की प्राइवेट प्रैक्टिस का स्कोप है। लगातार नए बड़े अस्पताल शुरू हो रहे हैं। सरकारी अस्पतालों के रेडियोलॉजिस्ट निजी अस्पतालों में एमआरआई, ईईजी, ईसीजी करते हैं।
पैथोलाजिस्ट का भी निजी लैब से संपर्क रहता है। कार्रवाई से बचने के लिए इनकी रिपोर्ट पर निजी अस्पताल या लैब के डॉक्टर अपने साइन करते हैं।
दून में कमाई को देखते हुए डॉक्टरों को डर रहता है कि दो-तीन साल भी पहाड़ चले गए तो निजी प्रैक्टिस खत्म हो जाएगी। ऐसे में यही मानते हैं कि प्राइवेट प्रैक्टिस सही चलती रही तो सरकारी नौकरी छोड़ना घाटे का सौदा नहीं।
पहचान के लिए दून का इस्तेमाल
ज्यादातर डॉक्टर दून अस्पताल में नौकरी पहचान बनाने के लिए करते हैं। प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल होने के कारण यहां तैनात होने वाले डॉक्टर शासन, सरकार से लेकर बड़े निजी अस्पतालों तक पैठ बना लेते हैं।
इसके अलावा मरीजों के बीच भी उनका नाम हो जाता है। कुछ साल नौकरी के बाद वे निजी अस्पतालों का रुख करते हैं या अपना क्लीनिक खोल लेते हैं। पहचान पहले से होने के कारण मरीज भी उन्हें तवज्जो देते हैं।
सूत्र बताते हैं कि इसी वजह से कई निजी विशेषज्ञ डॉक्टर भी दून अस्पताल में संविदा पर नौकरी के लिए तैयार रहते हैं। पहचान की वजह से वे तबादले भी रोकते रहते हैं। संयुक्त निदेशक पद पर प्रमोट हुए दून अस्पताल के अधिकतर डॉक्टर दस साल से यहीं जमे हुए हैं।
सरकारी डॉक्टरों द्वारा प्राइवेट प्रैक्टिस करना अवैध है। शिकायतें आने पर जांच भी कराई जाती है। पिछले साल भी कुछ डॉक्टरों को नोटिस दिया गया था। उनसे प्राइवेट प्रैक्टिस न करने का शपथपत्र लिया था। ठोस सबूत न मिलने से ऐसे डॉक्टर अक्सर कार्रवाई से बच जाते हैं।
- डॉ. जीएस जोशी, स्वास्थ्य महानिदेशक, उत्तराखंड
जमी जमाई प्राइवेट प्रैक्टिस छूटने का डर डॉक्टरों के पहाड़ न जाने की वजह है। हम सभी डॉक्टरों ने अलग राज्य बनने पर उत्तराखंड में नौकरी करने का विकल्प भरा था, सिर्फ देहरादून का नहीं। संघ पहाड़ न जाने और प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डाक्टरों के सख्त खिलाफ है।
- डॉ. बीएस जंगपांगी, प्रदेश अध्यक्ष, प्रांतीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा संघ