देश के मशहूर वैज्ञानिक प्रो.यशपाल का उत्तराखंड से था गहरा लगाव, यहां आकर करते थे ये काम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महान वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और लोक विज्ञानी प्रोफेसर यशपाल को उत्तराखंड से बेहद लगाव था। वो कई बार भारतीय वन अनुसंधान और यूकॉस्ट के कार्यक्रमों में शिरकत करने और निजी दौरों पर उत्तराखंड आए थे।
उनके निधन से उत्तराखंड के वैज्ञानिक उदास और दुखी हैं। उनका कहना है कि विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने में प्रो. यशपाल का अहम योगदान रहा है, उनकी कमी को पूरा करना असंभव है।
यूकॉस्ट के महानिदेशक डा. राजेंद्र कुमार डोभाल बताते है कि प्रोफेसर यशपाल के साथ उनके बेहद निकट के संबंध रहे। वे भारत में विज्ञान के सबसे बड़े कम्युनिकेटर थे।
विज्ञान को परिवर्तन का हथियार बनाना चाहते थे। उनके देहांत के बाद यह जगह खाली हो गई। देहरादून, शिमला, दिल्ली में उनसे कई मुलाकातें हुई। उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला।
वे विज्ञान का लोकतांत्रिक करण करना चाहते थे। जितना ध्यान उनका उच्च शिक्षा पर था उससे कहीं अधिक बुनियादी तालीम को लेकर संवेदनशील थे। उत्तराखंड के पर्यावरण और विकास को लेकर वे वैज्ञानिक आधार पर मॉडल बनाने के प्रबल पक्षधर थे।
शिक्षाविद् व लोक विज्ञानी डा. एसके कुलश्रेष्ठ का कहना है कि प्रोफेसर यशपाल उच्च कोटि के वैज्ञानिक होने के साथ ही विज्ञान के प्रचार प्रसार के बहुत बड़े संवाहक भी थे।
जीव जंतुओं से बेहद प्यार था
वे विज्ञान को जनकल्याण का माध्यम मानते थे। विज्ञान को आम जन तक पहुंचाने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनके इस महान योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। हमें उन मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए काम करना होगा।
डीएवी पीजी कालेज में रसायन विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. आईपी पांडे का कहना है कि प्रोफेसर यशपाल मूलत: वैज्ञानिक सोच के व्यक्ति थे। विज्ञान कांग्रेस में चेन्नई, भुवनेश्वर और जयपुर में उनसे मुलाकात हुई थी।
एक बार वे देहरादून आए थे तो उनसे लोक विज्ञान पर गहन चरचा हुई थी। वे विज्ञान को परिवर्तन का बड़ा हथियार बनाना चाहते थे। वे बच्चों में विज्ञान के संस्कार अंकित करने के प्रबल पक्षधर थे।
उनका मानना था कि बिना विज्ञान के भीतरी और बाहरी प्रगति असंभव है। वे भीतर से बेहद सहृदय और उदार थे। उत्तराखंड से उन्हें बहुत लगाव था। वे वैज्ञानिक होने के साथ साथ प्रकृति प्रेमी भी थे। उनको जीव जंतुओं से बेहद प्यार था।
जानिए प्रोफेसर यशपाल के बारे में
भारतीय वन अनुसंधान संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक डा. पीजे सिंह का कहना है कि उन्हें विज्ञान की हर धारा से मुहब्बत थी। उनमें बच्चों जैसी जिज्ञासा थी। डा. पीके शर्मा का कहना है कि वे वर्ष 2006 व वर्ष 2008 में यहां आए थे।
प्रोफेसर यशपाल का जन्म 1926 में हुआ था। प्रोफेसर यशपाल भारत के प्रसिद्ध शिक्षाविद और वैज्ञानिक थे जिन्हें पद्म विभूषण के अलावा कई सम्मान से नवाजा गया था। यशपाल पंजाब विश्वविद्यालय से 1949 में भौतिकी में स्नातक की डिग्री ली। उन्होंने 1958 में मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इसी विषय पर पीएचडी की।
अपने पूरे जीवन में प्रोफेसर यशपाल अनेक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे हैं, जिनमें योजना आयोग में मुख्य सलाहकार, विज्ञान और टैक्नोलॉजी विभाग में सचिव और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में अध्यक्ष का पद शामिल है।
प्रोफेसर पाल दूरदर्शन पर अत्यंत चर्चित विज्ञान कार्यक्रम टर्निंग प्वाइंट में भागीदारी और विज्ञान को साधारण शब्दों में आम जनता तक पहुंचाने के प्रयासों के कारण खूब लोकप्रिय हुए। वे भारत की छाप जैसे विज्ञान से जुड़े टीवी कार्यक्रमों के एडवाइजरी काउंसिल में भी रहे हैं।