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वैज्ञानिकों के ‘बाप’ हैं आठवीं पास भागी चंद्र

Fri, 17 Oct 2014 04:05 PM IST
आनंद नेगी/ अमर उजाला, बागेश्वर
आनंद नेगी/ अमर उजाला, बागेश्वर Updated Fri, 17 Oct 2014 04:05 PM IST
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scientist bhagi chandra singh takuli.

आठवीं पास भागी चंद्र सिंह टाकुली वैज्ञानिकों के भी ‘वैज्ञानिक’ हैं। बात सुनने में जितनी अटपटी लगती है, उतनी ही सच है। 74 वर्ष के इस बुजुर्ग ने हिमालय की ऐसी जड़ी-बूटियों को अपने गांव खलझूनी में उगाया है, जो दुर्लभ हैं।

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कई वर्षों तक खेतों में मेहनत करने के बाद टाकुली अब जड़ी-बूटियों की खेती करने वाले हिमालय के प्रगतिशील किसान बन गए हैं और देश-विदेश के कृषि वैज्ञानिक उनसे परामर्श लेने उच्च हिमालय के इस अंतिम गांव तक आते हैं।
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1985 से पहले परिवार के भरण-पोषण के लिए वह बुग्यालों में भेड़ें चराया करते थे। बुग्यालों में दोहन के कारण इन जड़ी-बूटियों की प्रजातियां लुप्त होते देखा तो उनका संरक्षण करने और इसके उत्पादन को अपनी तकदीर से जोड़ने की ठानी।
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वह बुग्यालों से पौधे लेकर गांव आए और खेती शुरू की। शुरुआती पांच साल उन्हें खेतों से जड़ी-बूटियों के बजाय सिर्फ मायूसी मिली। क्योंकि कभी मिट्टी, मौसम, कीट और कभी बीमारी, रखरखाव नहीं होने की वजह से पौधों को नुकसान पहुंचता गया।

सालाना 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपए कमाई

scientist bhagi chandra singh takuli.

वह पांच साल इस बात पर ध्यान देते रहे कि आखिर कैसे कीट और रोगों से पौधों को संरक्षित किया जा सकता है और यही अनुभव उनका मार्गदर्शक बना।

इस वक्त उनकी 40 नाली भूमि में जटामासी, अतीस, चिरायता, कुटकी, कूट और काला जीरा पैदा होता है। सालाना 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपए वह इन जड़ी-बूटियों से कमा लेते हैं।

टाकुली ने अमर उजाला से एक भेंट में बताया कि इस कार्य में उन्हें गोपेश्वर स्थित जड़ी बूटी शोध संस्थान, जीबी पंत पर्यावरण संस्थान कोसी और जिला भेषज संघ का सहयोग मिलता है।

हिमालय पर्यावरण संस्थान कोसी और जड़ी बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर सहित कई संस्थाओं के वैज्ञानिक खलझूनी आकर उनसे मार्गदर्शन लेते हैं।

टाकुली से टिप्स लेने पहुंचे फ्रांस के वैज्ञानिक

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जेएनयू के वैज्ञानिक प्रो. केजी सक्सेना के साथ म्यांमार स्थित वन अनुसंधान संस्थान के सहायक शोध अधिकारी बिली नेविन और फ्रांस के लाओस स्थित सेंटर फार एग्रीकल्चर सोयल सर्वे एंड लैंड यूज (कृषि भूमि सर्वेक्षण और प्रयोग केंद्र) के वरिष्ठ वैज्ञानिक वींगक्से योचोटोया बागेश्वर पहुंचे हैं।

ये तीनों वैज्ञानिक मंडलसेरा में श्री टाकुली से मिले। दो शोध छात्र भी उनके साथ आए हैं। डॉ. सक्सेना 1990 से 95 तक कोसी पर्यावरण संस्थान कोसी में रहे। इसी साल जून में वह अध्ययन के लिए खलझूनी आए तो, वहां की प्रगति से प्रभावित हुए।

इस बार वह विदेशी वैज्ञानिकों को साथ लेकर बुजुर्ग भागी चंद्र सिंह टाकुली से जड़ी-बूटियों की खेती पर जानकारी लेने आए हैं। गुरुवार सुबह वैज्ञानिक खलझूनी गांव रवाना हो गए हैं।

हम मंगलवार को बागेश्वर आ गए थे। दो दिन श्री टाकुली के साथ मंडलसेरा में रहे तो इतने ही समय में उनसे बहुत कुछ सीख लिया है। अब तीन-चार दिन उनके गांव रहकर जड़ी-बूटियों के कृषिकरण, मृदा संरक्षण में प्रजातियों की उपयोगिता का प्रयोगात्मक अनुभव लिया जाएगा।
- वींगक्से योचोटोया, वरिष्ठ वैज्ञानिक, फ्रांस

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