हरक और विभाग की तनातनी में लटका सैनिक स्कूल
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दरअसल यह मामला प्रशासनिक से ज्यादा राजनीतिक और क्रेडिट लेने का बन चुका है जिससे अधिकारी भी कुछ करने में हिचक रहे हैं। समाधान निकालने के लिए मंगलवार को मुख्य सचिव एन रविशंकर ने खींचतान कर रहे दोनों विभागों के अधिकारियों को बुलाया।
नियमानुसार स्कूल का मामला शिक्षा विभाग के अधीन आता है, लेकिन प्रस्ताव से लेकर अनुमति तक की औपचारिकताएं सैनिक कल्याण विभाग ने पूरी की हैं। इसलिए सैनिक कल्याण मंत्री हरक सिंह रावत चाहते हैं कि स्कूल का निर्माण उनका महकमा करे।
दूसरी ओर, शिक्षा विभाग का तर्क है कि निर्माण के बाद स्कूल उनके अधीन आएगा इसलिए एमओयू पर दस्तखत उन्हें ही करना चाहिए। मुख्य सचिव के हस्तक्षेप के बाद भी यह तय नहीं हो पाया कि एमओयू पर हस्ताक्षर कौन करेगा। हालांकि उन्होंने अपर मुख्य सचिव एस राजू को दोनों विभागों से तालमेल कर अग्रिम कार्यवाही जल्द पूरी कराने के निर्देश दिए हैं।
किरकिरी के बाद भी नहीं सुधरी सरकार
मामले में पहले भी सरकार की किरकिरी हो चुकी है। सांसद बीसी खंडूड़ी ने दिसंबर में यह खुलासा किया था कि यह सैनिक स्कूल खोलने की अनुमति राज्य सरकार को मिल चुकी है, लेकिन मुख्यमंत्री तक को इसकी जानकारी नहीं है।
रक्षा मंत्रालय के भेजे अनुमति पत्र की शुरुआत कैबिनेट मंत्री हरक सिंह के डीओ लेटर के हवाले से हुई है, लेकिन शिक्षा विभाग ने इसकी जानकारी न विभागीय मंत्री को दी, न ही हरक सिंह को। सांसद खंडूड़ी ने 20 दिसंबर को जब अनुमतिपत्र सार्वजनिक किया तो सरकार जागी। खिन्न मुख्यमंत्री ने इस पर अधिकारियों को फटकार भी लगाई थी।
हरक शिक्षा विभाग से असहमत
यह स्कूल खोलने के लिए वर्ष 2009 से प्रयास चल रहे हैं, लेकिन वर्ष 2014 में मिली अनुमति सैनिक कल्याण मंत्री हरक सिंह की कोशिशों से हुई है। अनुमति से पहले हरक ने 10 करोड़ रुपये निर्माण साइट को तैयार करवाने के लिए अपने विभाग से स्वीकृत करवाए।
भवन बनाने के लिए जखोली में लगभग 52 एकड़ भूमि चयनित की गई है। अपने विधानसभा क्षेत्र से संबंधित मामला होने के चलते हरक अपने विभाग के अधीन इसका निर्माण कराना चाहते हैं।