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'डांगी की पोटली’ ने सिखाया बिजनेस का नया फंडा

Sat, 28 Feb 2015 06:21 PM IST
निशांत खनी/ अमर उजाला, हल्द्वानी
निशांत खनी/ अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Sat, 28 Feb 2015 06:21 PM IST
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sail of uttarakhand product in delhi.

जो काम सरकारी विभाग के अफसर और कर्मचारियों की फौज न कर सकी वह डांगी जी की पोटली ने कर दिखाया। डांगी जी की पोटली ने पहाड़ी उत्पादों को दिल्ली और एनसीआर में नई पहचान दी है। मडुवा, गहत की दाल, राजमा, काला भट और कई पहाड़ी उत्पादों की आज दिल्ली में जबर्दस्त मांग है।

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डांगी जी ने इनकी पोटली बनाकर इन्हें रिलायंस फ्रेश, बिग बाजार, खादी भंडार और केंद्रीय भंडार जैसे डिपार्टमेंटल स्टोरों के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचाया है। डांगी जी के प्रयासों से दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले पर्वतीय ही नहीं गैर पर्वतीय लोगों को भी ठेठ पहाड़ी परंपरागत उत्पादों का स्वाद लेने का मौका मिलता है।
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मूल रूप से रानीखेत के मजखाली निवासी चंदन सिंह डांगी वर्तमान में बहुराष्ट्रीय कंपनी हुंडई में दक्षिण पूर्वी एशिया के विपणन महाप्रबंधक हैं। डांगी जी का पहाड़ से बेहद लगाव है। यही वजह है कि डांगी जी ने 2000 में पहाड़ी उत्पादों को दिल्ली तक पहुंचाने का प्रयास किया।

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उत्तराखंड के 85 गांवों से खरीद रहे उत्पाद

sail of uttarakhand product in delhi.

‘डांगी की पोटली’ नाम से उन्होंने मडुवे का आटा, गहत, राजमा की दाल, अल्मोड़ा की बाल मिठाई जैसे उत्पादों को दिल्ली में रहने वाले पर्वतीय मूल के घरों तक पहुंचाया। धीरे-धीरे उनकी इस पहल से दूसरे लोग भी जुड़ते गए और नेटवर्क बढ़ता गया। बाद में इसका नाम डांगी जी की पोटली की जगह ‘पहाड़ की पुंतरी’ हो गया।

चंदन डांगी ने पहाड़ी उत्पादों के दिल्ली एवं आसपास में मार्केटिंग को बरकरार रखने के लिए दिल्ली में डिवाइन एग्रो इंडस्ट्रीज कंपनी बनाई। कंपनी ने पहाड़ से खरीदे जाने वाले उत्पादों की पैकिंग, छटनी और सफाई करने के लिए रामनगर में प्लांट लगाया।

हरीश जोशी बताते हैं, डिवाइन एग्रो उत्तराखंड में स्वयंसेवी समूह के माध्यम से 85 गांवों में पहाड़ी उत्पादों की खरीद कर रही है। समूहों को एडवांस में उनकी उपज का वाजिब दाम दिया जाता है। फसल तैयार होते ही रामनगर पहुंचने पर उसकी पैकिंग की जाती है।

रामनगर से दिल्ली, गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद और नोएडा में बड़े स्टारों में सप्लाई होती है। डांगी और जोशी बताते हैं, उनका मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि दिल्ली और दूसरे महानगरों में रहने वाले पर्वतीय मूल के लोगों को उनके पारंपरिक उत्पाद पहुंचाना है।

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