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कानून से बच नहीं पाएंगे गोह के शिकारी

प्रवेश कुमारी/ अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 02 Apr 2015 02:03 PM IST
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research for monitor lizard.

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गोह का शिकार करने केबावजूद कोई वैज्ञानिक सुबूत न होने से शिकारी सजा से बच निकलते थे। अब ऐसा नहीं होगा।
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देश में पहली बार गोह यानी वेरेनस प्रजाति की छिपकली का मालिक्यूलर एनालिसिस शुरू हुआ है। दून स्थित भारतीय जंतु सर्वेक्षण (जेडएसआई) इस काम को अंजाम दे रहा है।

गोह की खाल जूते, पर्स, बेल्ट आदि बनाने के काम में आती है, लिहाजा इसका अवैध व्यापार भी बड़े पैमाने पर होता है। मालिक्यूलर एनालिसिस से बरामद प्रजाति के निर्धारण में आसानी होगी, लिहाजा अब शिकारी संदेह का लाभ ले सजा के फंदे से बच नहीं सकेंगे।


वेरेनस के इस विश्लेषण में दो साल का वक्त लगेगा। प्रोजेक्ट की प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डा. अर्चना बहुगुणा बताती हैं कि यह छिपकली जलीय किनारों के साथ ही मिट्टी या रेत में बिल खोदकर रहती है।

पूरे उत्तर-पश्चिम (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा आदि) समेत अंडमान में भी यह बहुतायत में मिलती है। कोलकाता स्थित भारतीय जंतु सर्वेक्षण को बड़ी संख्या में शिकार संबंधी मामले रिपोर्ट हुए हैं, जहां से प्रजाति निर्धारण में सहायता मांगी गई है।

इस तरह मिलेगी मदद

हर प्रजाति की अपनी डीएनए संरचना होती है। शिकारियों से बरामद खाल या बाल के डीएनए का मिलान गोह की डीएनए संरचना से होगा। इससे प्रजाति निर्धारित हो जाएगी। साथ ही वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों केआधार पर कार्रवाई संभव होगी।  अधिनियम के तहत गोह के शिकार पर रोक है।

नई प्रजाति भी की जाएगी चिन्हित
भारतीय जंतु सर्वेक्षण में उत्तर-पश्चिम में पाई जाने वाली छिपकलियों का माइटोकांड्रियल एनालिसिस भी किया जाएगा। इनकी फाइलोजीन, जेनेटिक संरचना का भी विश्लेषण किया जाएगा। नई प्रजाति का भी चिन्हीकरण होगा।

महिला विशेष प्रोजेक्ट है यह
प्रोजेक्ट की खासियत यह है कि इस प्रोजेक्ट को महिला विशेष प्रोजेक्ट के तहत शुरू किया गया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने इसके लिए दो साल का समय और 28 लाख रुपये स्वीकृत किए हैं। इसे अंकिता राजपूत अंजाम देंगी।

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