रणवीर एनकाउंटर: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे पुलिसकर्मी, याचिका स्वीकार
- दस साल पहले हुए फर्जी एनकाउंटर प्रकरण में 17 पुलिसकर्मी दोषी करार हुए थे।
- 11 पुलिसकर्मियों को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया था बरी
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देहरादून के बहुचर्चित रणबीर एनकाउंटर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका स्वीकार कर ली है। दस साल पहले हुए फर्जी एनकाउंटर प्रकरण में सीबीआई की विशेष अदालत (दिल्ली) में उत्तराखंड पुलिस के कुल 17 पुलिसकर्मी दोषी साबित हुए थे।
बाद में इनमें से दिल्ली हाईकोर्ट ने 11 को बरी कर दिया था जबकि सात को हत्या व अन्य धाराओं में दोषी माना था। रणबीर फर्जी एनकाउंटर प्रकरण में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने नौ जून 2014 में 17 पुलिसकर्मियों को हत्या, अपहरण, साक्ष्य मिटाने आदि में दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
11 पुलिसकर्मियों को हाईकोर्ट ने किया था बरी
इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों ने हाईकोर्ट दिल्ली का दरवाजा खटखटाया, जहां चार साल सुनवाई चली। हाईकोर्ट ने 2018 में अपने फैसले में सात पुलिसकर्मियों को दोषी मानते हुए निचली अदालत की सुनाई सजा को बरकरार रखा था जबकि 11 पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया था।
इस फैसले को लेकर सात पुलिसकर्मियों (एसके जायसवाल, नितिन चौहान, राजेश, चंद्रमोहन रावत, जीडी भट्ट, नीरज यादव व अजीत सिंह) ने देश की सर्वोच्च अदालत में अपील की, जिसे बुधवार को स्वीकार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका स्वीकार होने को इन पुलिसकर्मियों के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
ये है मामला
तीन जुलाई 2009 को देहरादून पुलिस ने एक बदमाश को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। पुलिस के अनुसार आरोपी आराघर चौकी इंचार्ज जीडी भट्ट का सर्विस रिवाल्वर लूटकर भागा था। बाद में उसकी पहचान रणबीर निवासी खेकड़ा, जिला बागपत के रूप में हुई थी।
मुठभेड़ को लेकर भारतीय किसान यूनियन समेत कई संगठनों ने दून में हंगामा किया था। दो दिन बाद आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद पुलिस कटघरे में आ गई थी। रणबीर के शरीर पर गोलियों के 22 निशान पाए गए थे।
यही नहीं रिपोर्ट में ब्लैकनिंग यानी सटाकर गोलियां मारना और 28 चोटों के निशान भी पाए गए। इस मामले में पहले सीबीसीआईडी ने विवेचना की और फिर सीबीआई ने इसकी सारी परतें उधेड़ दी थी।