रामपुर तिराहा गोलीकांड बरसी: बेटे के इंतजार में दुनिया से विदा हो गए माता-पिता, गंगनहर में बहा दी गई थी लाश
रामपुर तिराहा गोलीकांड की आज 31वीं बरसी है। दो अक्तूबर को इस आंदोलन में अठूरवाला निवासी और एसजीआरआर देहरादून में बीएससी फाइनल के छात्र राजेश नेगी (21) भी लापता हो गए थे। बेटे के इंतजार में माता-पिता दुनिया से विदा हो गए।
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पूरे प्रदेश में मुजफ्फरनगर रामपुर तिराहा कांड की 31वीं बरसी मनाई जाएगी। राज्य प्राप्ति के लिए बसों में सवार होकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर रामपुर तिराहे पर गोलियां बरसाई गई थी। जिसमें कई आंदोलनकारी बलिदान हो गए थे।
दो अक्तूबर को इस आंदोलन में अठूरवाला निवासी और एसजीआरआर देहरादून में बीएससी फाइनल के छात्र राजेश नेगी (21) भी लापता हो गए थे। अब तक उनके पार्थिव शरीर का कुछ पता नहीं चल सका। इस आंदोलन में उनके बड़े भाई मनोज नेगी भी साथ थे।
गोलियां चलने के बाद मनोज अन्य आंदोलकारियों के साथ वहीं धरने पर बैठ गए। जिसके बाद वो शाम तक अन्य साथियों के साथ मुजफ्फरनगर के अस्पतालों में अपने भाई को ढूंढते रहे। किसी ने बताया कि कुछ लोगों को देहरादून ले जाया गया है तो फिर देहरादून आकर अस्पताल और अन्य स्थानों पर राजेश को तलाश किया गया। लेकिन कभी भी राजेश का पार्थिव शरीर उनके परिजनों को नहीं मिल सका। बेटे के इंतजार में पिता महावीर सिंह 1999 में दुनिया से चले गए। जबकि मां सोना देवी का 2016 में निधन हो गया। सोना देवी को कभी नहीं बताया गया कि उनका बेटा राज्य प्राप्ति की लड़ाई में बलिदान हो गया। जब भी मां अपने बेटे राजेश के बारे में पूछती तो परिजन कहते कि आज नहीं तो कल राजेश जरूर आएगा। इसी इंतजार में सोना देवी दुनिया से चली गई। संवाद
तो गंगनहर में बहा दी गई थी राजेश की लाश
राजेश के परिजनों के अनुसार गोली लगने के बाद राजेश की लाश को गंगनहर में फेंक दिया गया था। जिस कारण उसकी लाश कभी नहीं मिल सकी। बलिदानी के नाम पर भानियावाला तिराहे पर एक स्मारक और अठूरवाला में शहीद द्वार का निर्माण कराया गया है।
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सिर्फ तीन जिलों तक सिमट गया है विकास : खंडूड़ी
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच के प्रदेश महामंत्री रामलाल खंडूड़ी ने कहा कि प्रदेश का विकास सिर्फ तीन जिलों तक सिमट गया है। पहाड़ी जिले आपदा से त्रस्त हैं। सत्ता में बैठे सभी लोगों ने कभी गैरसैंण को स्थाई राजधानी नहीं बनने दिया। राज्य गठन से पहले जब यूपी में थे तो मूल निवास प्रमाणपत्र मिलता था। जबकि आज नए और कई पीढि़यों से प्रदेश में रह रहे सभी लोगों को स्थाई निवास प्रमाणपत्र दिया जा रहा है। राज्य आंदोलन के लिए युवाओं को परेड मैदान में धरने पर बैठना पड़ता था और 25 वर्ष बाद भी पेपर लीक रोकने को उसी परेड मैदान में बैठना पड़ रहा है।