बाबा रामदेव ने दांव चला तो पलट गई हरिद्वार की बाजी
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योग गुरु बाबा रामदेव ने वीटो लगाकर आखिरी समय में हरिद्वार की बाजी को पलटने में मुख्य भूमिका अदा की।
निशंक के लिए बाबा के अड़ियल रुख के सामने पार्टी दंभ नहीं भर सकी और मदन कौशिक जीती हुई लड़ाई हार गए। उधर, भाजपा की राजनीति में जनरल व भगतदा का बड़ा कद एक बार फिर सामने आया।
टिहरी से सीटिंग एमपी होने का लाभ महारानी को मिला तो अल्मोड़ा से अजय टम्टा एक बार फिर प्रभावशाली लॉबी पर भारी पड़े।
काफी खफा थे बाबा रामदेव
दरअसल, बिहार की लोकसभा सीट पाटलीपुत्र से अपने चेले के बजाय राजद से आए रामकृपाल को टिकट दिए जाने से बाबा रामदेव काफी खफा थे।
उन्होंने नाराजगी जाहिर भी की। शनिवार को हरिद्वार का नंबर लगा तो बाबा ने साफ कहा कि यदि निशंक को टिकट नहीं मिला तो नाराजगी और बढ़ेगी। आखिर समय तक दौड़ में आगे चल रहे मदन कौशिक पीछे हो लिए।
उधर, निशंक ने भी तर्क दिया कि यदि दो अन्य पूर्व सीएम (खंडूड़ी व कोश्यारी) चुनाव लड़े और उन्हें (निशंक) टिकट नहीं दिया तो विपक्ष द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के तमाम आरोपो को बल मिलेगा।
निशंक की जिद और बाबा के वीटो ने राह की आसान
निशंक की जिद और बाबा के वीटो ने टिकट की राह आसान कर दी। कौशिक समर्थकों ने काफी लॉबिंग की कि एक सीट पर तो किसी मैदानी क्षेत्र के नेता को टिकट मिलना ही चाहिए।
लेकिन बात नहीं बनी। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि बाबा रामदेव के साथ कांग्रेस से जुड़े साधुसंतों ने भी निशंक की जोरदार पैरवी की।
उधर, पौड़ी संसदीय सीट से जनरल बीसी खंडूड़ी ने एक बार फिर साबित किया कि उम्रदराज होना और राजनीतिक करना बिल्कुल अलग बात है।
लाख विरोध के बावजूद खामोश रहे जनरल एक बार फिर मोर्चे पर आ डटे। उनकी साफ सुथरी छवि का भी बड़ा योगदान रहा। एक बार ज्यादा उम्र वालों को राज्यसभा भेजने की वकालत करने वाले बीसी खंडूड़ी अब लगभग दस साल बाद लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे।
विश्वासपात्र होने का फायदा कोश्यारी को मिला
सियासी बिसात बिछाने में माहिर पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी का भी बड़ा कद बाकी पर भारी पड़ा।
तमाम दिग्गजों ने उनकी राह रोकने की कोशिश की लेकिन बेलागलपेट अपनी बात कहना और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के विश्वासपात्र होने का फायदा उन्हें मिला। टिकट के साथ ही वह काफी मजबूती के साथ आगे आए।
उधर, अल्मोड़ा से अजय टम्टा अपनी सादगी के चलते एक बार फिर प्रभावशाली लॉबी पर भारी पड़े। उनके पक्ष में स्थानीय संगठन, विधायक आदि सभी ने खूब जोर लगाया था।
हालांकि केंद्र में बैठे कुछ नेता रेखा आर्य को टिकट दिलाने में लगे थे। टिहरी से महारानी को एकमात्र फायदा सीटिंग एमपी होने का मिला। हालांकि मुन्ना ने भी जोर लगाया था लेकिन कामयाबी हासिल नहीं हुई।