राष्ट्रपति राजा नहीं, उनके निर्णय की भी हो सकती है समीक्षा: हाईकोर्ट
- उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के निर्णय पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
- राष्ट्रपति हों या जज, किसी के भी फैसले गलत हो सकते हैं
- फैसला आने से पहले राष्ट्रपति शासन हटाने को लेकर केंद्र को भी चेताया
- कहा, हमें उम्मीद है कि ऐसा कर केंद्र सरकार कोर्ट को नहीं उकसाएगी
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उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के मामले पर सुनवाई कर रहे हाईकोर्ट ने बुधवार को तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि असीमित शक्ति किसी को भी भ्रष्ट कर सकती है फिर चाहे वह राष्ट्रपति ही क्यों न हों। राष्ट्रपति के निर्णय की भी समीक्षा हो सकती है, वह कोई राजा नहीं हैं। उनके फैसले भी गलत हो सकते हैं।
वहीं, हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को भी इशारों में चेता दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि हमें उम्मीद है कि राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली याचिका का निपटारा न होने तक केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन हटाकर कोर्ट को उकसाने का काम नहीं करेगी। मामले में बृहस्पतिवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।
मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ ने बुधवार को राष्ट्रपति के संबंध में यह टिप्पणी तब की जब केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 356 को लागू करने का फैसले अपने विवेक के आधार पर किया है।
राष्ट्रपति और जज भी कर सकते हैं गलत फैसले
इस पर पीठ ने कहा कि लोग गलत फैसले भी कर सकते हैं, चाहे वे राष्ट्रपति हों या फिर जज। राष्ट्रपति के समक्ष जो तथ्य पेश किए गए, उन्होंने उसके आधार पर फैसला लिया, लेकिन इसकी समीक्षा हो सकती है।
सुनवाई के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आशंका जाहिर की कि अदालत का फैसला आने या रिजर्व किए जाने से पहले ही केंद्र सरकार उत्तराखंड से राष्ट्रपति शासन हटा सकती है। इस पर पीठ ने केंद्र को चेताते हुए कहा कि हमें उम्मीद है कि वे ऐसा करके हमें नहीं उकसाएंगे। रावत ने राष्ट्रपति शासन को चुनौती दी है।
बृहस्पतिवार को भी होगी मामले में सुनवाई
सिंघवी ने आशंका जाहिर की कि केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि अनुच्छेद 356 पर 17 अप्रैल तक कुछ नहीं किया जाएगा, लेकिन अब यह तिथि बीत चुकी है।
अदालत में पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस बारे में कोई पुष्टि नहीं की कि राष्ट्रपति शासन हटाने को लेकर केंद्र ने कोई फैसला लिया है या नहीं।
सिंघवी ने कहा कि कोर्ट का फैसला आने या रिजर्व रहने तक राष्ट्रपति शासन नहीं हटाया जाना चाहिए और न ही विपक्ष को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। अब मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी और रावत की राष्ट्रपति शासन को चुनौती देने वाली याचिका पर भी पीठ फैसला इसी दिन सुरक्षित कर सकती है।
पढ़िए, हाईकोर्ट में किसने क्या कहा
केंद्र की ओर से तुषार मेहता : सरकारिया कमीशन के अनुसार मनी बिल का विरोध अपने आप में सरकार पर अविश्वास प्रस्ताव के समान है। मनी बिल फेल होने पर राष्ट्रपति शासन आवश्यक है।
हाईकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि सरकारिया कमीशन आज की तारीख तक कानून नहीं बना है। इसका केवल एक भाग बोम्मई मामले में उचित ठहराया गया है।
तुषार मेहता: मनी बिल अविश्वास प्रस्ताव ही है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि संवैधानिक परंपराए कानून की ही शक्ति रखती हैं। यह एक संवैधानिक परंपरा है कि मनी बिल का फेल होना अविश्वास प्रस्ताव माना जाए।
हाईकोर्ट : 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से संतुष्ट होना आवश्यक है, जबकि राज्यपाल ने 19 मार्च के पत्र में 35 विधायकों का हवाला देते हुए यह उल्लेख नहीं किया है कि बिल पास नहीं हुआ था।
तुषार मेहता : राष्ट्रपति के पास राष्ट्रपति शासन संबंधी सिफारिश को वापस भेजने का विकल्प था लेकिन उन्होंने नहीं भेजा जिससे स्पष्ट है कि वे इस मामले से संतुष्ट थे। पूर्व मुख्यमंत्री विरोधियों को प्रताड़ित कर रहे थे और उन्होंने महाधिवक्ता को इसलिए हटा दिया क्योंकि वे एक बागी विधायक के भाई थे।
हाईकोर्ट : हम साठ वर्ष पूर्व से बहुत आगे बढ़ चुके हैं ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसे रिव्यू न किया जा सके। राष्ट्रपति कितने ही उच्च पदस्थ हों, लेकिन कानून उनसे ऊपर है। कोर्ट का निर्णय देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।
हरीश रावत के वकील अभिषेक मनु सिंघवी : राज्यपाल ने फ्लोर टेस्ट के लिए दस दिन दिए थे इस बीच कोई उल्लेखनीय घटना नहीं हुई थी। मत विभाजन को बांटा जाना राष्ट्रपति शासन का आधार नहीं हो सकता। हॉर्स ट्रेडिंग का एकमात्र इलाज फ्लोर टेस्ट है।
हाईकोर्ट : लोकतंत्र की जड़ किसी बिल को मत द्वारा पास करना है इस मामले में कोई वोटिंग हुई?
अभिषेक : यदि राष्ट्रपति हर निर्णय की समीक्षा करने लगेंगे तो कोई भी विधानसभा या स्पीकर सुरक्षित नहीं रहेंगे। स्पीकर के निर्णय को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है।