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प्रकाश पर्व 2020: गुरुनानक देव जी की तपोस्थली है गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब

Mon, 30 Nov 2020 10:25 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नानकमत्ता
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नानकमत्ता Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 30 Nov 2020 10:25 AM IST
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Prakash Parv 2020: Gurudwara Sri Nanakmatta Sahib is the place where Guru Nanak Dev Ji do tapasya
गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब

उत्तराखंड के ऐतिहासिक तीर्थ स्थलों में से एक पवित्र गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब सिखों के प्रथम गुरुनानक देव जी की तपोस्थली है। वे अपने शिष्य भाई मरदाना जी के साथ तीसरी उदासी में यहां आए थे। नानक देव जी की तपोभूमि नानकमत्ता साहिब में हर साल विश्व भर से श्रद्धालु शीश नवाने आते हैं।

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1508 ई. से पहले उत्तर भारत का यह क्षेत्र गोरखमत्ता के नाम से जाना जाता था और यहां गोरखनाथ के भक्त रहते थे। उस समय तक यह सिद्धों का भी निवास स्थान था। इसे सिद्धमत्ता भी कहा जाता था। पवित्र ग्रंथ गुरुवाणी में इस यात्रा का उल्लेख नानक देव जी की तीसरी उदासी अर्थात तीसरी यात्रा के रूप में किया गया है।
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सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव जी जब सन् 1515 में करतारपुर से कैलाश पर्वत की यात्रा करने निकले तो अपने शिष्य भाई मरदाना जी और बाला जी के साथ यहां आए थे। सिद्ध यहां पर साधना किया करते थे जो स्वभाव से अहंकारी थे।
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इसी स्थान पर गुरु नानक देव जी ने अहंकारी साधुओं का अहंकार तोड़कर उन्हें निर्मल ज्ञान और गुरुवाणी का संदेश दिया था। नानक देव ने उनसे कहा कि परिवार की सेवा ही सबसे सच्ची सेवा और ईश कार्य है। उनके वचन को सुन सिद्धों का अहंकार टूट गया। गुरु की वाणी में प्रकाश की अनुभूति हुई और वे उनके आगे नतमस्तक हो गए। 
 

पीपल को पंजा लगाकर रोका था

गुरुनानक देव जी ने नानकमत्ता गुरुद्वारा साहिब में स्थित पीपल के पेड़ के नीचे अपना आसन बनाया था। किंवदंती है कि सिद्धों ने गुरुनानक देव को छाया देने वाले पीपल को अपनी योग शक्ति से आंधी और बरसात के साथ उखाड़ दिया था। नानक देव जी ने पीपल पर अपना पंजा लगाकर उसे रोक दिया और पेड़ फिर हरा भरा हो गया। इस पेड़ को आज भी लोग पंजा साहिब के नाम से जानते हैं।

गुरुनानक जी के यहां से जाने के बाद कालांतर में सिद्धों ने फिर इस स्थल को अपने कब्जे में करने के लिए पीपल के पेड़ में आग लगाकर उसे जला दिया। उस समय बाबा अलमस्त जी यहां के सेवादार थे। सिखों के छठे गुरु हरगोविंद साहिब को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने यहां आकर केसर के छींटे मार इस पीपल के वृक्ष को पुन: हराभरा कर दिया। तब से इस पीपल के हरेक पत्ते पर केसर के पीले निशान मिलते हैं।

सरोवर में डुबकी लगाकर करते हैं अरदास

गुरुद्वारे में एक सरोवर है। सिख संगत सरोवर में स्नान करने के बाद हरमिंदर साहिब दरबार में मत्था टेक अपनी सुख शांति की अरदास करती है। मान्यता है कि गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर गुरुगोविंद साहिब से प्रभावित होकर अवध के राजकुमार नवाब मेहंदी अली खां ने गुरुद्वारा साहिब को अपनी 4500 एकड़ जमीन दान की थी जिस पर आज नानकसागर बैराज बना हुआ है।

छठे गुरु की रिहाई के दिन लगता है ऐतिहासिक मेला

सिखों के छठे गुरु हरगोविंद साहिब की रिहाई के दिन (बंदी छोड़ दिवस) यहां ऐतिहासिक मेला लगता है। माना जाता है कि औरंगजेब जब बीमार पड़ा तो उसने खुद को बचाने के लिए गुरु हरगोविंद साहिब को रिहा किया लेकिन गुरु हरगोविंद साहिब अकेले नहीं रिहा हुए और वहां कैद किए गए 52 लोगों को भी कैद से रिहा कराया। इस खुशी में सिख समुदाय दिवाली पर बंदी छोड़ दिवस का आयोजन करता है। इस समय गुरुद्वारे और नगर को भव्य रूप से सजाया जाता है।

फाउड़ी गंगा से पानी खींचकर लाए थे भाई मरदाना जी

मान्यता है कि गुरुनानक देव जी के शिष्यों को जब प्यास लगी तो गुरुनानक देव जी ने उनसे सिद्धों से पानी मांगने को कहा। इस पर सिद्धों ने पानी सूखने का हवाला देकर अपने गुरु से पानी मांगने को कहा। नानक देव जी के आदेश पर उनके शिष्य भाई मरदाना जी पानी लेने पहाड़ की तलहटी की ओर निकल पड़े।

उन्होंने जंगल से निकली गंगा नदी में लकड़ी का फावड़ा मारा तो नदी उनके पीछे चल पड़ी। मरदाना जी ने बाऊली साहिब पहुंच पीछे मुड़कर देखा तो नदी वहीं रुक गई। वहां आज भी बाऊली साहिब के नाम से कुआं बना है। शिष्यों और सिद्धों ने यहीं से अपनी प्यास बुझाई।

गायों का दूध सूखा तो कुएं से निकाल दिया दूध

सिद्धों ने तांत्रिक शक्ति से आसपास के पानी और गायों के दूध को सुखा दिया तो गुरुनानक देव जी ने इसी कुएं के जल को दूध बना दिया। इस वजह से आज भी इस कुएं को दूध वाला कुएं के नाम से जाना जाता है। यही किंवदंती भंडार साहिब की भी है। यहां बरगद का पेड़ होता था। भूख लगने पर गुरुनानक देव जी ने बरगद के पेड़ को हिलाया, उससे झड़े फल भोजन बन गए।

धार्मिक नगरी के साथ पर्यटन स्थल भी नानकमत्ता

गुरुनानक देव जी की तपोस्थली होने के साथ ही यह क्षेत्र पर्यटन स्थल भी है। गुरुद्वारा साहिब की ओर से यहां आने वाली संगत के ठहरने व खाने की पर्याप्त व्यवस्था की हुई है। गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कर संगत नानकसागर बैराज में फिशिंग और नौकायन का भी लुत्फ उठाती है।

गुरु नानक की साधना और चमत्कार का समागम है रीठा साहिब का गुरुद्वारा

लधिया और रतिया नदी के संगम पर बना रीठा साहिब का गुरुद्वारा आध्यात्मिकता के साथ अनेकता में एकता की मिसाल है। चंपावत से 75 किमी दूर रीठा साहिब सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की साधना और चमत्कारों का समागम है।

कड़वे से मीठे बने ये रीठे आध्यात्मिक चमत्कार को तो दर्शाते ही हैं, यही मीठे रीठे भक्तों को प्रसाद के रूप में भी दिए जाते हैं। इसके लिए परिसर में कई रीठे के पेड़ भी लगाए गए हैं। गुरुद्वारे से लगा मंदिर सर्वधर्म समभाव की सीख देता है। रीठा साहिब गुरुद्वारे में हर साल लाखों तीर्थयात्री मत्था टेकते हैं।

250 नाली जमीन में फैले इस गुरुद्वारा के प्रबंधक बाबा श्याम सिंह कहते हैं कि गुरु नानक जी 1514-15 में अपने दो सेवक मरदाना और बालाजी के साथ उत्तराखंड यात्रा के दौरान रीठा साहिब आए थे। इस दौरान उन्होंने सिद्धों के साथ शास्त्रार्थ कर उन्हें जीवन के सच का दर्शन कराया।

नानक जी ने शिष्यों को मानव कल्याण के लिए सांप्रदायिक सौहार्द की ज्योति जगाने का आदेश दिया। 1982 से 1987 तक राष्ट्रपति रहे ज्ञानी जैल सिंह देश के गृह मंत्री के रूप में 1981 में और उत्तराखंड के पहले राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला 2002 में गुरुद्वारे में मत्था टेक चुके हैं। 

कड़ुवे रीठे ऐसे हुए मीठे

गुरुद्वारा के प्रबंधक बाबा श्याम सिंह बताते हैं कि मीठे रीठे की इस चमत्कारी घटना का ब्योरा गुरुनानक प्रकाश के उत्तरार्द्ध अध्याय 20 में है। रीठा साहिब में अमृतवाणी के दौरान गुरु नानक ने शिष्य मरदाना को भूख लगने पर वहां मौजूद ढेरनाथ जी से भोजन लेने को कहा। ढेरनाथ जी ने कुछ देने के बजाय उल्टी नसीहत दे डाली कि वह जिन गुरु नानक जी को सर्व समर्थ मान रहे हैं, उन्हीं से मदद लें।

इस पर नानक जी ने सामने पेड़ से रीठे तोड़ भूख मिटाने को कहा। मरदाना के संकोच को देख गुरु नानक ने कहा खाओ भाई, रीठे कड़ुवे नहीं, मीठे हैं। गुरु के आदेश को मान मरदाना पेड़ पर चढ़कर रीठा खाने लगे और इन रीठों का स्वाद सचमुच छुआरों सा मीठा था। तबसे ये रीठे मीठे हो गए।

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