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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Pitru Paksha 2021: Now just turn your face south and weep, Shradh will be done

Pitru Paksha 2021: अब बस दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर आंसू बहाएं, हो जाएगा श्राद्ध 

Sat, 18 Sep 2021 08:20 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार
कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 18 Sep 2021 08:20 PM IST
सार

भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध पक्ष कहलाता है।  हिंदू धर्म के अनुसार, इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि किया जाता है।

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Pitru Paksha 2021: Now just turn your face south and weep, Shradh will be done
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

ब्रह्मांड में दक्षिण दिशा स्थित पितृलोक में निवास करने वाले पितृ श्रद्धा और भाव के भूखे होते हैं। सोलह दिनों के श्राद्ध पक्ष में यदि कुछ भी पास न हो तो दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख कर जल दे दें या आंसू ही बहा दें, श्राद्ध हो जाएगा। यह कहना है पंडित प्रियव्रत शर्मा का। श्राद्धों में यदि एक दिन पितृ श्राद्ध कर दें तो वर्षभर के लिए पितरों की क्षुधा शांत हो जाती है। यह भावनाओं का श्रद्धा पक्ष है जो वर्ष में एक बार अश्विन कृष्ण पक्ष में आता है।

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महालय और पितृ पक्ष के नाम से भी जाना जाता है श्राद्ध पक्ष
भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध पक्ष कहलाता है।  हिंदू धर्म के अनुसार, इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि किया जाता है। श्राद्ध पक्ष को महालय और पितृ पक्ष के नाम से भी जाना जाता है। श्राद्ध का अर्थ अपने देवताओं, पितरों, परिवार और वंश के प्रति श्रद्धा प्रकट करना है।
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वैदिक विद्वान मार्तंड पंचांग रचियता पंडित प्रियव्रत शर्मा के अनुसार धर्मग्रंथों में स्पष्ट बताया गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले जाते हैं, वह चाहे किसी भी रूप में या किसी भी लोक में हों, श्राद्ध पक्ष के समय पृथ्वी पर आते हैं। उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है। अत: मान्यता है कि पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम से तर्पण करते हैं उसे हमारे पितर सूक्ष्म रूप में आकर अवश्य ग्रहण करते हैं।

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क्या कहते हैं धर्मग्रंथ  

कूर्मपुराण में कहा गया है कि ‘जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्रचित होकर श्राद्ध करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुन: संसार चक्र में नहीं आता। गरुड़ पुराण के कहता है कि ‘पितृ पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, संतति, धन, विद्या सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार जो व्यक्ति शाक के द्वारा भी श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दु:खी नहीं होता। 

पितरों के साथ देव भी होते प्रसन्न 
विष्णु पुराण का संदर्भ देते हुए पंडित हरिओम जयसवाल शास्त्री बताते हैं कि श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होते हैं।

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