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चूल्हा जलाने के लिए ये कैसे मजबूरी!
अमर उजाला, कर्णप्रयाग
Updated Sun, 20 Jul 2014 07:45 PM IST
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इसे चूल्हा जलाने की मजबूरी समझे या फिर जान को खतरे में डालने की जिद्द, ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है उत्तराखंड में पिंडर नदी के किनारों पर।
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कर्णप्रयाग में पिंडरघाटी से नदी में बहकर आ रही टनों लकड़ी को लोग नदी किनारे कर ढेर लगा रहे हैं। इस काम में बड़े, बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे भी पीछे नहीं हैं।
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कभी भी आ सकती है आफत
पांच दिन से हो बारिश से गाड़-गदेरों से लेकर अलकनंदा और पिंडर नदी उफान पर हैं। तीन दिन से नगर में पिंडर नदी में बहकर आ रही लकड़ियों को पुराने पुल के निकट किनारे करने के लिए लोगों में होड़ लगी है, जबकि यहां पर नदी घुमावदार होने से लहरें हिलोरे मार रही हैं, जो कभी भी जान पर भारी पड़ सकती है।
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राकेश, दीपक, बीरेंद्र का कहना है कि नदी से लकड़ियां एकत्र कर बाद में बाजार में बेचेंगे, जिससे कुछ धन अर्जित हो सके।
नहीं है गैस कनेक्शन
कुछ महिलाओं का कहना था कि उनके घरों के लिए रसोई गैस कनेक्शन नहीं है। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां जुटानी पड़ती हैं। अब लकड़ियां एकत्र कर रहे हैं, जिससे अब उनकी सर्दियों तक की मुश्किल खत्म हो जाएगी।
धनश्याम कहते हैं कि रोजगार का कोई साधन नहीं होने से पिंडर नदी में जान हथेली पर रखकर लकड़ी एकत्र करना मजबूरी है।