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उत्तराखंडः जल्द पंचायत चुनाव संभव नहीं, साल के आखिर तक इंतजार
Wed, 17 Jul 2019 03:31 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Wed, 17 Jul 2019 03:31 PM IST
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पंचायत चुनाव अब इस साल के आखिरी में हो सकते हैं। पंचायत राज संशोधन बिल-2019 और आरक्षण के साथ ही बरसात भी चुनाव में देरी का कारण बन गई है। वैसे, सरकार जनवरी 2020 तक के लिए पंचायतों में प्रशासक व्यवस्था का बंदोबस्त कर चुकी है, लेकिन फिर भी सरकार इससे पहले चुनाव कराने के पक्ष में नजर आ रही है। इसके साथ ही पंचायत चुनाव के हमेशा देर से होने की परंपरा एक बार फिर आगे बढ़ गई है।
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ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त हो जाने के बाद अब क्षेत्र और जिला पंचायतों में अगस्त में प्रशासक नियुक्त हो जाएंगे। इन स्थितियों के बीच, शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक का कहना है कि पंचायत चुनाव जल्द से जल्द कराए जाएंगे। सरकार के स्तर पर जो भी औपचारिकताएं होनी हैं, उन्हें जल्द से जल्द पूरा कराया जाएगा।
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उत्तराखंड में पंचायत चुनाव-कब कब कितनी देर
01- राज्य बनने के बाद पहले पंचायत चुनाव फरवरी-मार्च 2003 में हुए, जबकि यह सितंबर-अक्तूबर 2001 में प्रस्तावित थे। हरिद्वार जिले के चुनाव पहली बार सितंबर-अक्तूबर 2005 में तय समय पर हुए।
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02- दूसरे पंचायत चुनाव अगस्त सितंबर 2008 में हुए, जबकि यह इसी वर्ष फरवरी-मार्च में प्रस्तावित थे। हरिद्वार जिले के चुनाव जनवरी फरवरी 2011 में हुए, जबकि यह सितंबर अक्तूबर 2010 में होने थे।
03- तीसरे पंचायत चुनाव मई जून 2014 में हुए, जबकि यह अगस्त सितंबर में प्रस्तावित किए गए थे। हरिद्वार जिले के चुनाव दिसंबर जनवरी 2015-16 में हुए, जबकि यह जनवरी फरवरी 2016 में होने थे।
त्रिस्तरीय पंचायत: पहले पायदान पर ही राह कठिन
त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था की पहली पायदान ग्राम पंचायतें हैं, लेकिन यहां पर राह आसान नहीं दिख रही है। बीते पांच साल में पहले पायदान के 440 पद खाली रह गए। इसमें सबसे ज्यादा 430 पद सदस्य ग्राम पंचायत के रहे। दस पद ग्राम प्रधान के भरे नहीं जा सके। राज्य निर्वाचन आयोग ने इन पदों को भरने के लिए छह-छह महीने के अंतराल में उपचुनाव भी कराए, लेकिन ये पद फिर भी नहीं भरे जा सके। सूत्रों के अनुसार, सदस्य ग्राम पंचायत के पदों के लिए गांवों में बहुत आकर्षण नहीं देखा गया। इस पद पर कोई खास वित्तीय अधिकार न होने के कारण इनके लिए उम्मीदवार तलाशने मुश्किल रहे।
इसके अलावा, कई जगह पद खाली रहने का कारण आरक्षण व्यवस्था भी रही। आरक्षित सीटों पर कई जगह उम्मीदवारों का घोर अभाव कारण रहा। आयोग के एक अफसर के अनुसार, यह एक बड़ा सवाल है कि इतनी बड़ी संख्या में कई बार उपचुनाव कराने के बावजूद किसी ने दावेदारी प्रकट नहीं की। वैसे, यह सिर्फ इस बार ही नहीं हुआ है, बल्कि पिछले कुछ सालों से ये ट्रेंड तेजी से स्थापित हो रहा है। इससे पहले भी 2014 में जब चुनाव कराए गए थे, तब भी खाली रह गए पदों की संख्या अच्छी खासी थी।
कहां कितने पद रह गए पांच साल में खाली
430 पद सदस्य ग्राम पंचायत के खाली रह गए। सबसे ज्यादा 98 पद टिहरी, 75 अल्मोड़ा, 73 पौड़ी जिले में खाली रहे हैं। इसके अलावा, 42 चमोली, 41 ऊधमसिंह नगर, 31 नैनीताल, 24 पिथौरागढ़, 17 उत्तरकाशी, 14 देहरादून, सात हरिद्वार, छह चंपावत, दो पद रुद्रप्रयाग जिले में भरे नहीं जा सके।
10 पद प्रधान के खाली रह गए हैं। इनमें से पांच पौड़ी, दो चमोली और एक-एक पिथौरागढ़, टिहरी और देहरादून में जिले में खाली रहे हैं। इसके विपरीत, सदस्य क्षेत्र पंचायत का सिर्फ एक पद खाली रह गया है। यह पद अल्मोड़ा जिले में नहीं भरा जा सका। सदस्य जिला पंचायत के सभी पद भरे गए।