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'खतरनाक' नदियों का फ्लड जोन तक तय नहीं

Wed, 18 Jun 2014 05:15 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 18 Jun 2014 05:15 PM IST
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one year of uttarakhand disaster, rambara

पिछले साल 16-17 जून को आपदा में भारी क्षति हुई। केदारनाथ यात्रा मार्ग का पड़ाव रामबाड़ा तो पूरी तरह से तबाह ही हो गया।

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ऐसे तो मिटते रहेंगे 'रामबाड़ा'

केदारघाटी की तबाही से पहले भी कुदरत हमें चेताती रही। लेकिन हम नजरअंदाज करते रहे। अगर यही हाल रहा तो भविष्य में ऐसे कई ‘रामबाड़ा’ नक्शे से मिटते रहेंगे और हम बाद में स्यापा करते रहेंगे।

एक साल बाद यह तो साफ हो ही चुका है कि प्रकृति के आगे किसी की नहीं चलती। रामबाड़ा की तबाही में जितना बड़ा हाथ कुदरत का था, उतना ही हमारा।

प्रकृति ने रौद्र रूप दिखाने से पहले कभी बेकाबू बारिश, तो कभी भूस्खलन के रूप में चेताया। उन सबको नजरअंदाज कर दिया गया। एक साल बाद भी तस्वीर जस की तस है। केदारनाथ आपदा की चेतावनी को भी नजरअंदाज करने का सिलसिला जारी है।
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फ्लड जोन में बसा था रामबाड़ा
रामबाड़ा के मिटने के बाद यह बात भी सामने आई कि पूरा कस्बा नदी के फ्लड जोन में बसा हुआ था। संकरी और संवेदनशील घाटी में कभी इस बात की परवाह नहीं की गई कि अनाप-शनाप रिहायश न हो।
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बड़े होटल और लॉज न बनें। पानी की निकासी का रास्ता बंद न हो। जरूरत से ज्यादा लोग संवेदनशील जगहों पर जमा न हो जाएं। लोग अगर संवेदनशील स्थानों पर जमा भी हों तो उन्हें इस बात का अहसास हो कि वे किन खतरों की जद में हैं।

खतरा अगर सामने आ जाए तो कैसे उससे निपटें। पर केदारनाथ से तमाम सबक सीखने के दावे के बाद भी प्रदेश ‘चल बैतलवा फिर उसी डाल’ की तर्ज पर बढ़ने की कोशिश करता दिख रहा है।

सरकार ने केदारनाथ की आपदा के बाद जीईपी (सकल पर्यावरण उत्पाद) लाने का दावा किया था।

जीईपी का वादा भी इसलिए था कि पर्यावरण और विकास के संबंध में पड़ताल की जा सके और कुदरत का सम्मान रखते हुए विकास का खाका खींचा जाए।

कहा तो यह भी गया था कि नदियों के फ्लड जोन में स्थित तमाम बस्तियों को हटाया जाएगा। बाकायदा इसके लिए बाढ़ क्षेत्र अतिक्रमण अधिनियम भी लाया गया। पर नदियों का फ्लड जोन ही अभी तय नहीं हो पाया है।

कहां चेते हम
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर भागीरथी और अलकनंदा में प्रस्तावित 24 परियोजनाओं के अध्ययन के लिए बनी कमेटी भी कह चुकी है कि 23 बांध तो मानकों के लिहाज से बनने ही नहीं चाहिए थे।

पर उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने का सपना पाले सरकार फिर भी बांध के पक्ष में है। सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा इसकी पैरवी करने की तैयारी है।

हाल यह है कि पर्यावरण की अनदेखी न करने का दावा कर रही सरकार गंगोत्री इको सेंसिटिव जोन का विरोध कर रही है।

कहा जा रहा है कि जोन से विकास रुक जाएगा। ईको सेंसिटिव जोन के तहत क्षेत्र की महायोजना तैयार करने की बजाय सरकार का ध्यान इस बात पर है कि जोन की वजह से कंक्रीट की बाढ़ रुक जाएगी।

कितनी झीलें बन रहीं ध्यान नहीं

हिमालयी क्षेत्र में करीब 2500 ग्लेशियर हैं। ऐसे में चौराबाड़ी की तरह कितनी झील पनप रही हैं, इस पर भी ध्यान नहीं दिया गया। चौराबाड़ी झील ने ही केदारनाथ में तबाही मचाई थी।


मौसम बदल रहा है। राज्य ने 2012 में जलवायु परिवर्तन का ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया था। दो माह पूर्व मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में नौ हजार करोड़ रुपये की कार्ययोजना पर पहली बैठक हुई।

आपदा की बढ़ती घटनाओं के बावजूद न तो इस कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है और न ही आपदा प्रबंधन को ठोस रूप दिया गया।

यमुनोत्री भी खतरे की जद में

चार धाम में से एक यमुनोत्री को पहले ही केंद्रीय योजना आयोग खतरे की जद में बता चुका है।

सेटेलाइट इमेज की मदद से रिस्क ऐसेसमेंट की रिपोर्ट में पाया गया है कि मंदिर और मंदिर के चारों ओर ताजी संरचनाएं मलबा, भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है।

नदी के कटाव के कारण यह खतरा और बढ़ गया है। इस अध्ययन के आधार पर सुरक्षा के तमाम उपाय सुझाए गए हैं। इस दिशा में भी कदम आगे बढ़ते नहीं दीखते।

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