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गंगा ‘सफाई कर्मियों’ को निगल गया खनन

Sun, 23 Nov 2014 08:13 AM IST
प्रवेश कुमारी/ अरम उजाला, देहरादून
प्रवेश कुमारी/ अरम उजाला, देहरादून Updated Sun, 23 Nov 2014 08:13 AM IST
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non vegetarian tortoise killed in river ganga.

हरिद्वार और इससे लगने वाले इलाकों में नदी से अवैध खनन रोकने के लिए लगाए गए 'सफाई कर्मियों' को खनन माफिया निगल गए हैं।

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आलम यह है कि जिन मांसाहारी कछुओं को गंगा सफाई अभियान के तहत गंगा में छोड़ा गया था, वह अब नदारद हैं। खनन की वजह से कछुए शिकारियों के आसान और मुफीद शिकार बने हुए हैं।

भारतीय जंतु सर्वेक्षण (जेडएसआई) के विशेषज्ञ स्थिति को चिंताजनक बताते हैं। उन्हें चिंता मोरेनिया पिट्रेसी प्रजाति के कछुए की खास तौर पर सता रही है, जिसे उत्तराखंड में पहली बार 2010 में देखा गया।
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आईयूसीएन ने देश में दुर्लभ मानते हुए लुप्त प्राय की सूची में रखा है। यह भी दोबारा नहीं दिखा है।

कछुओं के लिए स्थिति को बेहद संवेदनशील

non vegetarian tortoise killed in river ganga.

भारतीय जंतु सर्वेक्षण की प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर अर्चना बहुगुणा अन्य जलीय जंतुओं के साथ विशेष रूप से कछुओं के लिए स्थिति को बेहद संवेदनशील बताती हैं।

उनके मुताबिक गंगा में मांसाहारी कछुए इसलिए छोड़े जाते हैं, क्योंकि वह सड़े-गले शवों को आहार बनाते हैं और गंगा की सफाई में योगदान देते हैं। क्षेत्र के दौरे में अब इनके दर्शन नहीं हो रहे हैं।

वह इसे खनन के साथ ही सीधे शिकार से जोड़कर देख रही हैं। डॉ. बहुगुणा ने ही मोरेनिया पिट्रेसी को हरिद्वार अध्ययन क्षेत्र से पहली बार रिपोर्ट किया था।

उनके मुताबिक क्षेत्र में गंगा समेत इसकी सहायक नदियों बाणगंगा और सोलानी से कछुओं की कुल 13 प्रजातियां रिपोर्ट हुई हैं, जिनमें दो नई मिली हैं। मोरेनिया पिट्रेसी के साथ ही फंगशुरा टेंटोरिया सरकमडेटा।

सिंगापुर, चीन, हांगकांग बड़े खरीदार

non vegetarian tortoise killed in river ganga.

फंगशुरा टेंटोरिया सरकमडेटा को वन्य जीव अधिनियम-1972 के तहत संरक्षित श्रेणी में रखा गया है। वहीं मोरेनिया पिट्रेसी को बिहार में 1990 में दिखने के बाद यहां 20 वर्ष बाद रिपोर्ट किया गया था। बहुगुणा ने इसका मॉलीक्यूलर एनालिसिस भी किया है।

विभिन्न प्रकार की दवाओं में प्रयुक्त होने की वजह से कछुओं की देश से तस्करी बड़े पैमाने पर होती है। चीन, सिंगापुर, हांगकांग जैसे देश इसके बड़े खरीदार हैं। अपने देश की बात करें तो कोलकाता, कानपुर जैसे इलाकों में इसकी बड़ी खपत है।

कोलकाता मुख्यालय को भेजी है रिपोर्ट
डॉ. अर्चना बहुगुणा ने 2012-13 में किए प्रायोगिक अध्ययन की इस रिपोर्ट को कोलकाता स्थित भारतीय जंतु सर्वेक्षण (जेडएसआई) के मुख्यालय को भी भेजा है। इसके नतीजे अभी अप्रकाश्य हैं।

उन्होंने खनन के साथ ही कृषि क्षेत्र के विस्तार, पानी के स्तर में गिरावट, प्रदूषण, शिकार को कछुओं की कमी के खास तौर पर जिम्मेदार बताया है।

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