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शिकारी दे रहे 'पहाड़ों के राजा' को शिकस्त
प्रेम प्रताप सिंह/अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 21 Dec 2013 12:49 PM IST
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लचर कानून और मुकदमों की कमजोर पैरवी उत्तराखंड में बाघ और गुलदार जैसे दुर्लभ वन्यजीवों के लिए काल बन रही है। शिकारी पकड़े तो जाते हैं लेकिन चंद दिनों में जमानत पर छूट जाते हैं। फिर वन्यजीवों की हत्या शुरू कर देते हैं।
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ऐसा कई मामलों में देखने में आया है। आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। वर्ष 2011 में जहां बाघों के शिकार के 11 मामले सामने आए थे, वहीं 2012 में इनकी संख्या बढ़कर 25 हो गई।
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केस - 1
उत्तराखंड के कुख्यात शिकारी धर्मवीर ने 2008 में तराई वेस्ट वन प्रभाग में एक गुलदार मारा था। जेल भी गया लेकिन कुछ दिनों में छूट गया। फिर उसने राजाजी में एक बाघिन की हत्या कर दी जिसकी खाल के साथ फरवरी 2012 में धरा गया, फिर जमानत पर छूट गया।
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अब धर्मवीर को 15 दिसंबर 2013 की रात अमानगढ़ टाइगर रिजर्व में दो बाघों की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
केस - 2
मोहम्मद उमर पहली बार धर्मवीर संग बाघिन के शिकार में धरा गया था। जेल गया, लेकिन जमानत पर छूट गया। इसी साल दो नवंबर को उत्तराखंड और यूपी की संयुक्त टीम ने पीलीभीत के पास बाघ के पांच शिकारियों को पकड़ा।
उसी गिरोह में उमर भी था लेकिन फरार हो गया। अब वह दोबारा धर्मवीर के साथ ही अमानगढ़ टाइगर रिजर्व से रंगे हाथ पकड़ा गया है।
केस - 3
तोताराम ने 2007 और 2009 में तराई वेस्ट वन प्रभाग में दो बाघों का शिकार किया था। दोनों बार गिरफ्तार हुआ, लेकिन जमानत पर छूट गया। 2011 में एक बार फिर हल्द्वानी वन प्रभाग में बाघ के शिकार मामले में उसे गिरफ्तार किया गया, अब वह खुलेआम घूम रहा है।
केस - 4
बालकू 2011 में कार्बेट के कालागढ़ में एक बाघ के शिकार में पकड़ा गया था। जेल जाने के कुछ दिन बाद जमानत मिल गई। 2012 में फिर उसने कार्बेट के ही बिजरानी रेंज में एक बलशाली बाघ का शिकार कर दिया। इसमें उसके भाई प्रिया का भी हाथ बताया गया, अब वह जेल से बाहर है।
क्या है सजा
बाघ या गुलदार मारने पर पहली बार शिकार पर तीन से सात साल की सजा दी जाती है। जबकि दूसरी बार शिकार करने पर कम से कम सात साल की सजा का प्रावधान है।
वन्यजीव प्रेमियों की मान्यता
वन्यजीव प्रेमी इस सजा को कम मानते हैं। वे बहुत दिनों से इस सजा को बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं। वहीं उनका ये भी कहना है कि दूसरी बार पकड़े जाने पर इन्हें जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
क्या कहते हैं अधिकारी
अब वन्यजीव अपराधियों के रिकार्ड रखे जा रहे हैं। दूसरी बार पकड़े जाने वाले अपराधियों के बारे में पूरे साक्ष्य पेश किए जाएंगे जिससे वे जेल से बाहर न आने पाएं।
निशांत वर्मा, उप निदेशक सेंट्रल वाइल्ड लाइफ कंट्रोल ब्यूरो