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खिलाड़ियों संग भेड़-बकरियों सा सुलूक
अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 06 Jan 2014 11:50 AM IST
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रविवार को उत्तराखंड के लिए मेडल लेने की आस लिए देहरादून से रवाना होने वाले खिलाड़ी ट्रेन में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस दिए गए। वहीं जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी प्लेटफॉर्म पर ठहाके लगाते नजर आए।
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बोगियों में घुसने के लिए मारामारी
दून रेलवे स्टेशन प्लेटफॉर्म पर दून-हावड़ा एक्सप्रेस में जनरल बोगियों के भीतर घुसने के लिए मारामारी हो रही थी। स्लीपर कोच में भी यही स्थिति थी। राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रदेश के 138 खिलाड़ी भी इसी ट्रेन से रांची जाने वाले थे।
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अमर उजाला स्टेशन पहुंचा तो मालूम हुआ कि खिलाड़ी स्लीपर कोच में बैठ चुके हैं। संवाददाता एक कोच में घुसा तो एक-एक सीट पर चार से पांच खिलाड़ी सिमटे हुए बैठे नजर आए। पूछा तो मालूम हुआ कि रिजर्वेशन हुआ है या नहीं, खिलाड़ियों को पता नहीं।
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साथ आए टीचरों ने उन्हें कोच में जाकर बैठ जाने के लिए कहा तो वे घुस गए। कुछ खिलाड़ियों ने बताया कि रिजर्वेशन किए हुए लोग आ रहे हैं और उन्हें सीट से हटा दे रहे हैं। कुछ खिलाड़ी तो कई बार सीटें बदल चुके थे। लेकिन अगली सीट भी कब छिन जाए, कोई अंदाजा नहीं।
रिजर्वेशन का पता नहीं
यहां का हाल देख अमर उजाला ने एसी कोच के बाद लगे डिब्बे का रुख किया। बताया गया था कि बालिका खिलाड़ियों को वहां सीट दी गई है। लेकिन, यहां भी हर सीट पर चार से पांच बालिकाएं बैठी नजर आईं। जवाब भी वही, रिजर्वेशन का पता नहीं है।
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राज्य के लिए मेडल लेने की आस लिए ये खिलाड़ी ट्रेन में जहां भेड़-बकरियों की तरह ठूंस दिए गए थे। वहीं जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी प्लेटफॉर्म पर ठहाके लगाते नजर आए। इससे पहले कि उनसे रिजर्वेशन न होने के बाबत पूछा जाता, ट्रेन के इंजन ने सीटी बजाई और साथ जाने वाले शिक्षक दौड़कर डिब्बों में सवार हो गए।
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कहीं किसी के चेहरे पर यह चिंता तक नजर नहीं आई कि सैकड़ों मील का सफर ये खिलाड़ी बिना सीट, बिना आराम कैसे पूरा करेंगे। ट्रेन रवाना तो हो गई, लेकिन इसमें सवार खिलाड़ी इस दर्दनाक सफर के बाद रांची में खेलेंगे कैसे, खेलेंगे भी तो मेडल जीतेंगे कैसे... जैसे सवाल पीछे छोड़ गई।
ठिठुरते हुए काटी थी रात
राज्य के इन खिलाड़ियों के प्रति उदासीन रवैये की यह दास्तान नई नहीं है। इससे पहले शनिवार को वर्णी जैन इंटर कॉलेज में भी इन खिलाड़ियों को सर्द रात में ठिठुरने के लिए छोड़ दिया गया था।
न तो इन्हें ठीक से भोजन देने की व्यवस्था की गई थी, न ही सोने-ओढ़ने का प्रबंध। खास बात यह रही कि प्रदेश के विभिन्न जिलों से अभ्यास के नाम पर बुलाए गए इन खिलाड़ियों को एक दिन भी प्रशिक्षण नहीं दिया गया।