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उत्तराखंड में हुआ संयुक्त राष्ट्र संघ का 'अपमान'

Fri, 12 Dec 2014 12:58 PM IST
Updated Fri, 12 Dec 2014 12:58 PM IST
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no celebration on pahad diwas at uttarakhand.

उत्तराखंड ने संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा पर अमल न करके संयुक्त राष्ट्र संघ का अपमान किया है। संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पर अमल करते हुए 11 दिसंबर को विश्व के कई देशों में पहाड़ दिवस मनाया गया।

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लेकिन इस दिन पर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड में सन्नाटा पसरा रहा। सरकार से लेकर गैर सरकारी संगठनों ने भी चुप्पी ओढ़े रखी।

2003 में पर्वतीय क्षेत्रों को विशिष्ट मानते हुए संयुक्त राष्ट्र ने हर साल 11 दिसंबर को पहाड़ दिवस के आयोजन का ऐलान किया था। तब से हर साल एक खास थीम के साथ पूरे विश्व में पहाड़ दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
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इस बार की थीम पर्वतीय खेती थी और यह उत्तराखंड के लिए मायने भी रखती है। बात-बात पर आयोजन करने वाली राज्य सरकार और गैर सरकारी संगठनों को भी याद नहीं आया कि पहाड़ दिवस पर कोई आयोजन भी किया जा सकता है। सत्ता पक्ष 18 दिसंबर को दिल्ली में प्रस्तावित धरने की तैयारी में ही उलझा हुआ है।
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कांग्रेस प्रवक्ता धीरेंद्र प्रताप के मुताबिक उन्हें पहाड़ दिवस की कोई जानकारी ही नहीं है। दिल्ली में आईएमआई ने सम्मेलन का आयोजन किया, उसी में मुख्यमंत्री शामिल हुए थे। अलबत्ता, दिल्ली में इंटीग्रेटेड माउंटेन इनीशिएटिव (आईएमआई) ने पहल की है।

दिल्ली में हिमालयी राज्यों के सम्मेलन के अंतिम दिन आईएमआई ने हर साल 11 दिसंबर को दिल्ली में पर्वतीय राज्यों का सम्मेलन करने का फैसला किया।

आईएमआई के अध्यक्ष डॉ. आरएस टोलिया के मुताबिक इस आयोजन में अन्य देशों की पर्वतीय संस्थाओं और लोगों को भी जोड़ लिया गया है। इस बार आईएमआई की मुख्य थीम भी पर्वतीय खेती ही थी।

पर्वतीय राज्यों पर मौसम बदलाव की मार

no celebration on pahad diwas at uttarakhand.

इस दौरान हिमालयी राज्यों के सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा मौसम में बदलाव की मार सबसे ज्यादा पहाड़ी राज्य झेलते हैं। पहाड़ में खेती की हालत काफी खराब है और आपदा प्रबंधन में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी आवश्यक है।

दो दिनी सम्मेलन के आयोजक आईएमआई के चेयरमैन डॉ. आरएस टोलिया ने कहा कि सम्मेलन के प्रस्तावों को केंद्र सरकार केसमक्ष रखकर पर्वतीय खेती को पटरी पर लाने के उपाय करने को कहा जाएगा।

सिक्किम के सांसद प्रेम दास राय ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों का वजूद बचाने के लिए एकजुटता जरूरी है। अरुणाचल प्रदेश के कृषि मंत्री छावना में ने कहा कि केंद्र को पर्वतीय क्षेत्र में कृषि विकास के लिए एक अलग एजेंसी गठित करना चाहिए। मेघालय के सांसद और पूर्व स्पीकर पीए संगमा ने पर्वतीय राज्यों के लिए अलग से कृषि मंत्रालय की मांग की।

सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर भी चिंता जाहिर की गई। नगालैंड के सांसद नैप्यू रियो ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक पर्वतीय प्रदेश प्रभावित हैं। सम्मेलन के दूसरे दिन विमर्श का एक मुख्य बिंदु जलवायु परिवर्तन भी था और इसमें लीमा में जारी सीओपी (कांफ्रेस ऑफ पार्टीज) 20 के सम्मेलन में शामिल हुए देशों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।

कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में आपदाओं का प्रकोप बढ़ रहा है। ऐसे में पर्वतीय प्रदेशों केलिए आपदा प्रबंधन से लेकर जलवायु परिवर्तन का सामना करने की तैयारी को पर्याप्त मदद दी जानी चाहिए। जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमाचल प्रदेश में सेब और सिक्किम में बड़ी इलायची की खेती को हुए नुकसान की भी चर्चा की गई।

हिमाचल प्रदेश के सांसद अनुराग सिंह ठाकुर, दार्जिलिंग से विधायक टीके दीवान, लद्दाख हिल काउंसिल के चेयरमैन रिगझिंग स्पलबार सहित अन्य कई जनप्रतिनिधियों ने विचार व्यक्त किए।

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