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उत्तराखंड के इस गांव में कोई लड़की नहीं बनती दुल्हन

Fri, 10 Jan 2014 12:04 PM IST
अमर उजाला, हल्द्वानी
अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Fri, 10 Jan 2014 12:04 PM IST
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no bride in namik village of uttarakhand

बेटी बचाओ के नारे और विज्ञापन आम हैं। लेकिन पिथौरागढ़ के नामिक जैसे दुर्गम गांवों में न तो ऐसे नारे पहुंचते हैं न वहां से बेटियां बाहर निकल पाती हैं।

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माता-पिता अब बेटी नहीं चाहते
वर्तमान में नामिक गांव के हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि वहां के लोगों को बेटी ब्याहने को दूल्हा खोजना मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि न चाहते हुए भी माता-पिता अब बेटी नहीं चाहते।
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तिब्बत के नजदीक और अपने जिला मुख्यालय से दूर पिथौरागढ़ का नामिक गांव मुसीबतों का दूसरा नाम है। यहां रहने वाले 118 परिवार गांव इसलिए नहीं छोड़ सकते क्योंकि पुरखों ने तिनका-तिनका जोड़ इसे बनाया था।

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इसके अलावा माली हालत भी गांव छोड़ने की इजाजत नहीं देती। पूर्व प्रधान भगत राम बताते है कि अब हालात बदल रहे हैं, क्योंकि मुसीबत जवान बेटियों पर आने लगी है। गांव में 100 में से करीब 40 लड़कियां ऐसी हैं, जिनकी उम्र शादी की हो चुकी है।


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डोली केवल इसलिए नहीं सज पा रही, क्योंकि गांव सड़क से 27 किमी दूर है। माता-पिता लाख कोशिशों के बावजूद ठीकठाक दामाद नहीं खोज पा रहे। दूसरी दिक्कत बेटियों की कम पढ़ाई-लिखाई है।

योजनाओं का भी कोई वास्ता नहीं
गांव के अध्यापक भगवान सिंह जमियाल बताते हैं कि हाईस्कूल के बाद लड़कियां पढ़ नहीं पाती। 100 में से केवल चार लड़कियां हैं जो गांव से बाहर पढ़ाई कर रही हैं।

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यही वह लड़कियां भी हैं जो हाईस्कूल से आगे पढ़ पाई, इसमें रामसिंह और लाल सिंह की बेटी मंजू और दीपा प्राइवेट बीए कर रही हैं, जबकि लक्ष्मण सिंह और प्रवीण सिंह की बेटी पूनम और देवकी इंटर की पढ़ाई कर रही हैं।

ऐसे में अब गांव छोड़ने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है, क्योंकि इस गांव तक सरकार की ओर से चलाई जा रही बेटी बचाने की तमाम योजनाओं का भी कोई वास्ता नहीं है।

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